सोमवार, 19 अगस्त 2019

अच्छी कहानी सच्ची कहानी -- बाटला हॉउस

 स्वतंत्रता दिवस यानि १५ अगस्त को रिलीज़ हुई फिल्म "बाटला हॉउस" यह फिल्म "बाटला हॉउस " २००८ में दिल्ली में हुए विवादित पुलिस एनकाउंटर ऑपरेशन से प्रेरित है इस पुलिस एनकाउंटर ने पूरे भारत में सवाल खड़े कर दिये थे । क्या यह दिल्ली पुलिस के लिए एक कवर-अप या वास्तविक जीत थी? ग्यारह साल बाद 'बाटला हाउस " मुठभेड़' के पीछे की कहानी देखने मिली फिल्म में
फिल्म "बाटला हॉउस " एक सिपाही, एक पुलिस अधिकारी, एक देशभक्त की सच्ची कहानी है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह एक समर्पित पति की कहानी है १९ सितंबर २००८ को दिल्ली के जामिया नगर के बाटला हॉउस इलाके में इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) के आतंकवादियों के खिलाफ पुलिस एनकाउंटर हुआ था, जिसमें दो आतंकवादी मारे गये थे, जबकि १ आतंकवादी को गिरफ्तार कर लिया गया था और २ आतंकवादी भागने में सफल रहे । एनकाउंटर स्पेशलिस्ट दिल्ली पुलिस के एक इंस्पेक्टर किशन कुमार भी इसमें शहीद हो गये थे । आतंकवादियों के खिलाफ पुलिस का यह एनकाउंटर डी सी पी संजीव कुमार यादव ( जॉन अब्राहम ) की निगरानी में हुआ था। जबकि यह एनकाउंटरआतंकवादियों के खिलाफ हुआ था फिर क्यों  डी सी पी संजीव कुमार यादव के खिलाफ सीनियर पुलिस अधिकारियों ने जाँच के आदेश दिये थे। यही इस फिल्म में दिखाया गया है।
निर्देशक निखिल आडवाणी का चुस्त निर्देशन और संवाद दिल को गहराई तक छू लेने वाले हैं। जॉन अब्राहम , रवि किशन , मृणाल ठाकुर आदि सभी कलाकारों का अभिनय अच्छा है। कोर्ट रूम ड्रामा बहुत ही उम्दा है।
दर्शकों को यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

फिल्म "रॉ " देखकर जॉन के प्रशंसकों को भी निराशा ही हाथ लगेगी

फिल्म -- रॉ यानि रोमियो अकबर वाल्टर ,५ अप्रैल २०१९ , हैदराबाद के पी वी आर में स्क्रीन - ७ में दोपहर १ बजकर ५ मिनट का शो , दर्शकों की उपस्थिति ५० प्रतिशत। फिल्म "रोमियो अकबर वाल्टर " से बहुत उम्मीदें थी , कारण - क्योंकि यह एक जासूसी थ्रिलर फिल्म है।  लेकिन इस फिल्म में तो नाममात्र को भी थ्रिल नहीं है।  बहुत ही धीमी फिल्म है , न कोई रोमाँच और न ही कोई ऐसा द्रश्य जिसे देखकर दर्शक दाँतो तले ऊँगली दबाने को मजबूर हो। जबकि आम तौर पर जासूसी फिल्म ऐसी होती है कि देखने वाले अपना दिल संभाल कर फिल्म देखें।  इस फिल्म को देखकर देश भक्ति का भी अहसास नहीं होता। आखिरी के दस मिनट में जैसा सस्पेंस देखने को मिला अगर वैसी ही पूरी फिल्म बनती तो यह फिल्म "राजी " के समक्ष होती।  लेकिन निर्देशक रॉबी ग्रेवाल ने "राजी " फिल्म से कुछ भी नहीं सीखा। 
मौनी को करने जैसा कुछ मिला ही नहीं।  जॉन तभी अच्छे लगे जब वो आखिरी नाम वाल्टर का किरदार निभा रहे थे। जॉन का चेहरा भी कुछ अजीब सा हो गया है।  फिल्म सच्चे किरदारों पर आधारित थी लेकिन फिल्म में कुछ भी असली और सच्चा दिखाई नहीं दिया। 
यह फिल्म "रॉ " अगर दर्शक नहीं देखे तो ज्यादा सुखी रहेगें।  जॉन के प्रशंसकों को भी निराशा ही हाथ लगेगी। फिर भी वो देखना चाहें तो देखें लेकिन अपने रिस्क पर। 

शुक्रवार, 1 मार्च 2019

मौड़ी कहने या गाली देने से भर से ही बागियों पर अच्छी फिल्म नहीं बन जाती

आज यानि १ मार्च को रिलीज़ हुई फिल्म "सोनचिड़िया" हैदराबाद के प्रसाद आईमैक्स के स्क्रीन - ६ में दोपहर २ बजकर १५ मिनट का शो , आईमैक्स जिसमें करीब ६०० दर्शक एक साथ फिल्म देख सकते हैं। लेकिन मात्र १४ दर्शक ही थे। र्निर्देशक और  संगीतकार विशाल भारद्वाज के सहायक रह चुके अभिषेक चौबे की  २०१०  में  पहली फिल्म आयी इश्क़िया , २०१४ में डेढ़ इश्क़िया , २०१६ में "उड़ता पंजाब "  और अब आयी यह फिल्म "सोनचिड़िया ". पता नहीं क्या सोच कर बनाई निर्देशक ने यह फिल्म।  आशुतोष राणा, मनोज बाजपेयी, रनवीर शौरी, सुशांत सिंह राजपूत, भूमि सारे कलाकार अच्छे हैं , अभिनय भी सबने अच्छा किया लेकिन फिर भी फिल्म में बहुत खामियाँ हैं। 

फिल्म का पहला द्रश्य -- सड़क पर बहुत बुरी अवस्था में मरा सापँ , देख कर लगा न जाने आगे क्या क्या होगा इस फिल्म में लेकिन ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया जिसे देख कर एक आम दर्शक को कुछ भी अच्छा लगेगा फिल्म में। जिस तरह हर बागी का धरम होत है अपनी जात बिरादरी की रच्छा करना उसी तरह एक निर्देशक का भी धरम है कि वो दर्शकों को ऐसी फिल्म दे जिससे उसकी कमाई के रूपये ऐसी फिल्म में ज़ाया न हों।  उसे फिल्म देखकर अफ़सोस न हो बल्कि चेहरे पर मुस्कान के साथ सिनेमा हॉल से बाहर निकले। 

सिनेमेटोग्राफी अच्छी है। बीहड़ ,पहाड़, नदी , भाषा सब कुछ अच्छा है लेकिन कहानी कहीं बहक गयी। मौड़ी कहने या गाली देने से भर से ही बागियों पर अच्छी फिल्म नहीं बन जाती।        

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

टोटल धमाल यानि टोटल मनोरंजन


आज यानि २२ फरवरी को रिलीज़ हुई फिल्म "टोटल धमाल" हैदराबाद के #पीवीआर  #पंजागुट्टा में ११ बजकर ४० मिनट का शो , दर्शकों की उपस्थिति ७० प्रतिशत। 

 फिल्म की शुरुआत होती है पैसा ये पैसा ( ऋषि कपूर की फिल्म "क़र्ज़ "के लोकप्रिय गीत "पैसा ये पैसा " ) रिक्रियेट किये गये गीत से।  अच्छा लगा गीत , नीली थीम और सभी के कपड़े नीले, भव्य सेट।  फिल्म में भरपूर हास्य है , वैसे भी हास्य फिल्मों में दिमाग को खर्च नहीं करना पड़ता , तो दिमाग का प्रयोग न करने की सलाह दी जाती है कुछ हास्य नया था तो कुछ व्हाट्स ऍप के फॉरवर्ड चुटकुले भी थे। लेकिन कुल मिलाकर दर्शकों को हँसाने के लिए काफी कुछ था। जिस तरह २००७ में आयी फिल्म "धमाल " में शुद्ध मनोरंजन था वैसा ही कुछ इस फिल्म में  भी था और सबसे बढ़कर कर बात फिल्म में दोहरे संवाद नहीं थे , किसी भी प्रकार की कोई अश्लीलता नहीं थी।  फिल्म टोटल धमाल यानि टोटल मनोरंजन साबित हुई ।  
निर्देशक इन्द्र कुमार ने मस्ती सीरीज़ की फिल्मों वाली कोई अश्लीलता फिल्म में नहीं दिखाई यह अच्छा है।  अनिल - माधुरी तलाक शुदा पति पत्नी, अजय देवगन और संजय मिश्रा , अरशद वारसी और जावेद जाफरी , रितेश देशमुख और पित्तोबाश त्रिपाठी , बोमन ईरानी और विजय पाटकर आदि जोड़ियों में थे , जबकि जॉनी लीवर, महेश मांजरेकर , सुदेश लहरी, मनोज पाहवा  अकेले थे , सभी का काम अच्छा था , सभी ने अपना -अपना काम अच्छे से निभाया।  सोनाक्षी सिन्हा " मुगड़ा " ( इंकार फिल्म का रीक्रियेट गीत  )  में डान्स करने के लिए आयी थी।  ईशा गुप्ता ने भी अतिथि कलाकार के रूप में काम किया। माधुरी दीक्षित के चेहरे पर उम्र दिखने लगी है। अनिल कपूर एकदम झकास लगे हैं। अजय देवगन  , अरशद वारसी स्मार्ट  लगे हैं। 

मानव (  जावेद जाफ़री ) जब भी परदे पर आता है दर्शकों को हँसाता है , इसी तरह संजय मिश्रा, रितेश देशमुख, जॉनी लीवर के संवाद पर दर्शक खूब हँसे। जैकी  श्रॉफ की आवाज़ भी थी फिल्म में , चिन्दी भाषा यानि चालू हिंदी में जी पी एस  की आवाज़ बने जैकी की बातचीत पर दर्शक बहुत हँसे।  साथ ही रितेश के भगवान को प्रसाद चढ़ाने की बात वाला द्रश्य भी अच्छा है। 


रोज मर्रा की भाग दौड़ भरी जिंदगी में कुछ पल निकालिये हॅसने के लिये।  मुझे पूरी उम्मीद है फिल्म "टोटल धमाल " आपको पसंद आयेगी