फिल्म का पहला द्रश्य -- सड़क पर बहुत बुरी अवस्था में मरा सापँ , देख कर लगा न जाने आगे क्या क्या होगा इस फिल्म में लेकिन ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया जिसे देख कर एक आम दर्शक को कुछ भी अच्छा लगेगा फिल्म में। जिस तरह हर बागी का धरम होत है अपनी जात बिरादरी की रच्छा करना उसी तरह एक निर्देशक का भी धरम है कि वो दर्शकों को ऐसी फिल्म दे जिससे उसकी कमाई के रूपये ऐसी फिल्म में ज़ाया न हों। उसे फिल्म देखकर अफ़सोस न हो बल्कि चेहरे पर मुस्कान के साथ सिनेमा हॉल से बाहर निकले।
सिनेमेटोग्राफी अच्छी है। बीहड़ ,पहाड़, नदी , भाषा सब कुछ अच्छा है लेकिन कहानी कहीं बहक गयी। मौड़ी कहने या गाली देने से भर से ही बागियों पर अच्छी फिल्म नहीं बन जाती।