शुक्रवार, 1 मार्च 2019

मौड़ी कहने या गाली देने से भर से ही बागियों पर अच्छी फिल्म नहीं बन जाती

आज यानि १ मार्च को रिलीज़ हुई फिल्म "सोनचिड़िया" हैदराबाद के प्रसाद आईमैक्स के स्क्रीन - ६ में दोपहर २ बजकर १५ मिनट का शो , आईमैक्स जिसमें करीब ६०० दर्शक एक साथ फिल्म देख सकते हैं। लेकिन मात्र १४ दर्शक ही थे। र्निर्देशक और  संगीतकार विशाल भारद्वाज के सहायक रह चुके अभिषेक चौबे की  २०१०  में  पहली फिल्म आयी इश्क़िया , २०१४ में डेढ़ इश्क़िया , २०१६ में "उड़ता पंजाब "  और अब आयी यह फिल्म "सोनचिड़िया ". पता नहीं क्या सोच कर बनाई निर्देशक ने यह फिल्म।  आशुतोष राणा, मनोज बाजपेयी, रनवीर शौरी, सुशांत सिंह राजपूत, भूमि सारे कलाकार अच्छे हैं , अभिनय भी सबने अच्छा किया लेकिन फिर भी फिल्म में बहुत खामियाँ हैं। 

फिल्म का पहला द्रश्य -- सड़क पर बहुत बुरी अवस्था में मरा सापँ , देख कर लगा न जाने आगे क्या क्या होगा इस फिल्म में लेकिन ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया जिसे देख कर एक आम दर्शक को कुछ भी अच्छा लगेगा फिल्म में। जिस तरह हर बागी का धरम होत है अपनी जात बिरादरी की रच्छा करना उसी तरह एक निर्देशक का भी धरम है कि वो दर्शकों को ऐसी फिल्म दे जिससे उसकी कमाई के रूपये ऐसी फिल्म में ज़ाया न हों।  उसे फिल्म देखकर अफ़सोस न हो बल्कि चेहरे पर मुस्कान के साथ सिनेमा हॉल से बाहर निकले। 

सिनेमेटोग्राफी अच्छी है। बीहड़ ,पहाड़, नदी , भाषा सब कुछ अच्छा है लेकिन कहानी कहीं बहक गयी। मौड़ी कहने या गाली देने से भर से ही बागियों पर अच्छी फिल्म नहीं बन जाती।