समीक्षा -- हिंदी फिल्म --पगलैट
निर्माता -- शोभा कपूर , एकता कपूर , गुनीत मोंगा और अचिन जैन
लेखक और निर्देशक -- उमेश बिष्ट
कलाकार -- सान्या मल्होत्रा , आशुतोष राणा ,रघुवीर यादव , राजेश तैलंग , शीबा चड्डा , सयानी गुप्ता
संगीत -- अरिजीत सिंह
गीत -- नीलेश मिश्रा , रफ़्तार
आवाज़ --अरिजीत सिंह ,सन्नी आर , हिमानी कपूर ,अमृता सिंह , राजा कुमारी ,रफ़्तार , अन्तरा मित्रा , झुम्पा मंडल ,चिन्मयी श्रीपदा , मेघना मिश्रा , सुमाना बनर्जी
पिछले दिनों ने नेटफ्लिक्स पर फिल्म "
पगलैट" रिलीज़ हुई है। जिसकी कहानी है संध्या (सान्या मल्होत्रा ) की , जिसकी शादी अभी पांच महीने पहले ही हुई थी आस्तिक से। आस्तिक की मृत्यु हो गयी है और उसकी तेहरवीं के लिए रिश्तेदार जुड़ना शुरू हो गए है लेकिन संध्या को पति के मरने का गम नहीं है। आम लड़कियों की तरह नहीं वो रो रही है न ही कुछ ख़ास परेशान है। क्योंकि आस्तिक से उसे कुछ ज्यादा लगाव भी नहीं हो पाया था उसे तो चिप्स खाने है , कोल्ड ड्रिंक पीना है और घर से बाहर जाकर उसे गोल गप्पे खाने है। आस्तिक बहुत अच्छा था उसने नया घर लिया था उसकी किश्तें जानी थी अब वो मर गया है तो कैसे लोन की सारी किश्तें जायेंगी , घर खर्च कैसे चलेगा , तेहरवीं का खर्चा भी बहुत हो रहा है कहाँ से कैसे यह सब होगा ? इसी सोच में आस्तिक के पिता शिवेंद्र गिरी ( आशुतोष राणा ) और उसकी माँ उषा ( शीबा चड्डा ) परेशान हैं लेकिन उन्हें अपनी बहू संध्या की भी बहुत चिंता है। आस्तिक ने मरने से पहले ५० लाख का बीमा किया था जिसकी नॉमिनी है संध्या। अब आस्तिक के मरने के बाद सारा पैसा संध्या को ही मिलेगा। जिससे संध्या के माँ - पापा खुश है जो संध्या को घर वापस नहीं ले जाना चाहते थे क्योंकि उनकी दो बेटियाँ और भी है जिनकी शादी भी करनी हैं। लेकिन जैसे ही संध्या को ५० लाख मिलने की बात होती है वो भी अपनी बेटी को अपने घर ले जाना चाहते हैं इसी तरह आस्तिक के चाचा भी संध्या की शादी अपने बेटे के साथ करना चाहते हैं। इसी बीच संध्या को आस्तिक की अलमारी से एक लड़की आकांशा रॉय ( सयानी गुप्ता ) की फोटो मिलती है। जब आस्तिक के ऑफिस के लोग शोक मनाने घर आते हैं तो उनमें आकांशा भी होती है अब संध्या आकांशा और आस्तिक के बारें में सब कुछ पूछती है और आस्तिक से भी नफरत होने लगती है। इसी तरह तेरहवीं का दिन भी आ जाता है संध्या तेहरवीं में सबके साथ हिस्सा लेती है और एक चिट्टी अपनी माँ के नाम ,एक चिट्टी अपनी सास के नाम छोड़ कर घर से चली जाती है और फिर यही खतम होती है फिल्म एक अच्छे संदेश के साथ।
तेरहवीं के इर्द गिर्द कई फ़िल्में बन चुकी हैं लेकिन यह फिल्म कुछ अलग है क्योंकि इसमे संध्या का किरदार अलग है। आखिर के कुछ संवाद भी दिल को छू लेते हैं हैं जैसे --" जब लड़की लोग को अक्ल आती है तो सं उन्हें पगलैट ही कहते हैं।" लड़कियों की फ़िक्र सब करते हैं लेकिन लड़किया क्या सोचती हैं इसकी फ़िक्र कोई नहीं करता " इसी तरह दो - एक और भी हैं।
सान्या मल्होत्रा , आशुतोष राणा , शीबा चड्डा , रघुवीर यादव आदि सभी ने अच्छा अभिनय किया है।देखने लायक फिल्म है। एक बार जरूर देखें।