फिल्म "दम लगा के हईशा " में वैसे तो कोई बहुत बड़े स्टार नहीं हैं लेकिन इस फिल्म में फिल्म की कहानी , निर्देशन , संवाद और अभिनय ही स्टार हैं। एक बहुत ही सादी सी कहानी को बहुत ही उम्दा तरीके से इस फिल्माया गया है .
९० के दशक की कहानी है फिल्म में। उत्तर प्रदेश का एक लोकप्रिय शहर हरिद्वार , जिसमें एक कैसेट की दुकान हैं उसमें बैठने वाला प्रेम (आयुष्मान खुराना ) जिसे अंग्रेजी के प्रश्न पत्र , अपने पिताजी की चप्पल और कुमार सानू के गीतों में ही सबसे ज्यादा दर्द नज़र आता है। कुमार सानू के गीतों का दीवाना प्रेम दसवीं भी पास नही कर सका। प्रेम की शादी उसके घरवाले पिताजी ( संजय मिश्रा) माँ ( अलका अमीन ) बुआ ( शीबा चड्डा ) उसकी मर्जी के बिना एक पढ़ी लिखी बी ए बी एड पास लेकिन मोटी लड़की संध्या ( भूमि पेडणेकर ) से करा देते हैं यह सोच कर कि लड़की पढ़ी लिखी है तो नौकरी करेगी तो कुछ अच्छे दिन उनके भी आ जायेगें। लेकिन प्रेम को एक खूबसूरत सी स्लिम सी लड़की चाहिये थी। जिसे लेकर वो यहाँ वहाँ घूमने में ख़ुशी महसूस कर सकें। प्रेम को संध्या पसंद नही आती वो उसके वजन को लेकर सबके सामने मजाक बनाता है। पढ़ी लिखी संध्या अपना अपमान बर्दाश्त नहीं कर पाती और अपने मायके चली जाती है और तलाक की अर्जी दे देती है. लेकिन जज के कहने पर वो दोनों फिर ६ महीने के लिये साथ रहने को तैयार हो जाते हैं।
इसी दौरान हरिद्वार में 'दम लगा के हईशा " प्रतियोगिता का आयोजन होता है और अपनी बुआ के कहने पर इसमें प्रेम भी संध्या के साथ हिस्सा लेने को तैयार हो जाता है और जीत जाता है। प्रेम और संध्या भी हंमेशा के लिये एक दूसरे के पास आ जाते हैं.
वैसे तो इस तरह की बेमेल शादी बहुत होती हैं रूपये पैसे और दहेज़ के लिये। इस फिल्म में भी संध्या की शादी उसकी टीचर की नौकरी के लिए होती है।
फिल्म में कुछ दृश्य बहुत ही मनोरंजक हैं जैसे ९० के दशक की कहानी है फिल्म में तो फिल्म में प्रेम और संध्या के बीच लड़ाई भी उस समय के हिट गीतों को टेप रिकॉर्डर में बजा कर होती है। प्रेम को अंग्रेजी नही आती वो उससे दूर ही भागता है लेकिन जब संध्या अपने मायके चली जाती है तब प्रेम तीसरी बार दसवीं की परीक्षा देता है लेकिन उसे अंग्रेजी नही आती तो हिंदी में ही उत्तर पुस्तिका में एक चिठ्ठी लिख आता है कि आज वो आत्म हत्या कर लेगा तो उसी रात में उसके घर टीचर और पुलिस का आना। स्लिम होने के चक्कर में संध्या का उबला हुआ खाना खाना ,
फिल्म में हरिद्वार जैसे शहरों की मानसिकता को भी बहुत ही खूबसूरती से दिखाया है निर्देशक शरत कटारिया ने. ९० के दशक की फिल्म हो और कुमार सानू का जिक्र न हो यह तो हो ही नहीं सकता। फिल्म का नायक प्रेम कुमार सानू का दीवाना दिखाया है तो फिल्म में गीत भी उन्हीं की आवाज़ में हैं और फिल्म में आखिरी में भी वो कुमार सानू के ही रूप में नज़र भी आते हैं। हो सकता है इस फिल्म के बाद फिर एक बार उनके चाहने वालों को उनके गाये गीत सुनने की मिल जायें।
फिल्म में मनोरंजन भी है साथ में एक सन्देश भी है केवल शारीरिक सौंदर्य ही सभी कुछ नही होता , अच्छा व्यवहार भी साथ साथ जिन्दगी बिताने के लिये बहुत मायने रखता है।
स्वतंत्र निर्देशक के रूप में शरत की यह पहली ही फिल्म है लेकिन इससे पहले उन्होंने कुछ फिल्मों में सहायक निर्देशक और लेखक के रूप में काम किया है।
कुल मिलाकर आप जब फिल्म देखने जायेगें तो आपको बोरियत तो बिलकुल भी नही होगी हाँ मनोरंजन जरूर होगा। फिल्म रिलीज़ के तीन दिन के बाद जितने दर्शक सिनेमा हॉल में थे उसके मुताबिक़ फिल्म निर्माता यानि यशराज़ फिल्म्स को फायदा ही हुआ होगा।
हिंदी फिल्मों के गुज़राती फिल्म निर्माता जो की कई वजहों से चर्चा में रहे थे अपनी नई प्रेयसी के साथ फिल्म का आनंद ले रहे थे।
आखिरी नोट --- दर्शक जब फिल्म देखने जाते हैं तब उन्हें अपने फोन पर नही फिल्म में ध्यान देना चाहिये , अगर कुछ जरुरी काम है तो हॉल से बाहर जाकर कर लें जिससे दूसरे दर्शको तकलीफ़ न हो।
आप भी इस फिल्म के बारें में कुछ कमेंट्स लिखना चाहे तो प्लीज़ जरूर लिखे। मेरी समीक्षा में कमी नज़र आये तो उससे भी अवगत करायें। धन्यवाद !
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