शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

अच्छे हैं बी एफ जी यानि बड़े फ़रिश्ते जी

वाल्ट डिज़्नी पिक्चर्स और स्टीवन स्पिलबर्ग की यह फिल्म बड़े फ़रिश्ते जी यानि बी एफ जी ( द बिग फ्रेंडली जायंट ) हिंदी में डब फिल्म है।  वैसे तो यह अंग्रेजी भाषा की ही फिल्म है लेकिन अब लगभग सभी    फ़िल्में हिंदी भाषी दर्शकों लिए भी उपलब्ध हैं।   

निर्देशक स्टीवन स्पिलबर्ग ने यह फिल्म बच्चों के लिए बनाई है और बच्चों को पसन्द भी आयेगी। १९८२ में  रोआल्ड ढल के लिखे हुए  उपन्यास पर आधारित फिल्म यह एक अनाथ लड़की  और बी एफ जी की है जिन्हें प्यार से बच्चे बड़े फ़रिश्ते जी के नाम से बुलाते हैं. बी एफ जी  दैत्यों के राज्य में रहने वाले एक अच्छे दैत्य हैं  जो की अन्य दैत्यों की तरह इंसानों को अपना भोजन बनातें बल्कि जिससे लोग खुश हो सकें ऐसे सपने खोजते हैं और रात में शहरों  में घूम घूम कर बच्चों और बड़ों सभी की सपने दिखाते हैं। ऐसे ही एक रात १० साल की बच्ची सोफ़ी ( रूबी बार्नहिल ) से उसकी मुलाक़ात होती है. 

सोफी की हिंदी डबिंग परिणीति चोपड़ा ने की है जबकि बी एफ जी यानि मार्क रीलांस की डबिंग हमारे बिग बी ने की है।  हिंदी के साथ बीच - बीच में भोजपुरी भाषा सुनकर मज़ा आ रहा था  बिग बी की आवाज़ में. बच्चों  को मज़ा आयेगा जब थ्री डी में वो २४ फुट के बी एफ जी को देखकर जब वो हिंदी बोलेगें।      



सोमवार, 25 जुलाई 2016

"मदारी -- शि....... देश सो रहा है " -- सच में देश सो ही रहा है

पी वी आर सिटी मॉल , अँधेरी वेस्ट ,मुम्बई। 
 फिल्म "मदारी " दोपहर १२ बजे का शो, मुश्किल से १५ - २० दर्शक , वो भी इरफ़ान खान की फिल्म में।  बहुत अफ़सोस की बात है. अभी कोई अश्लील संवादों वाली हास्य फिल्म होती तो शायद दर्शक भरे होते थियेटर में। ये सब देख कर लगता है कि सच में देश सो ही रहा है. 

"मदारी -- शि.......  देश सो रहा है " यह टैग लाइन है फिल्म "मदारी" की।  सच में देश सो रहा है कितने लोग ऐसे ही मर जाते हैं , पुल गिर जाता है , राह में चलते आम आदमी का अपहरण हो जाता है, हत्या हो जाती है, ट्रेन ब्लास्ट हो जाता है, लोग मर जाते हैं ,ऐसे हादसे में जिस घर का व्यक्ति मरता है बस उसी पर दुखों का पहाड़ टूट जाता है।  बाकि तो सारा देश वैसे ही चलता रहता है जैसे पहले चलता था। कोई खबर लेने वाला नही सबकी दुकान पहले की तरह चलती रहती है।  

आम इंसान जिसके वोट के सहारे देश के राजनिति चलती है , सत्ता में बैठ कर मंत्री अपना घर भरते रहते हैं ऐसे में वो आम इंसान क्या करे जिसका बच्चा , पति , पत्नी किसी हादसे का शिकार हो जाये और सरकार मरने वाले की कीमत या मुआवज़ा देकर उसके परिवार वालों को चुप बैठने पर मजूबर कर देती है।  फिर सोते हुए देश को जगाने के लिए आम इंसान वो ही करता है जो कि फिल्म में निर्मल कुमार  (इरफ़ान खान ) ने किया।  जिस दर्द से वो गुज़रता है वही दर्द वो देश के गृह मंत्री को देता है। 
 इरफ़ान कैसे कलाकार हैं यह किसी को भी बताने की जरूरत नही है , निर्देशक निशिकान्त कामत ने शैलजा केजरीवाल की कहानी को अच्छा बनाने की कोशिश की है लेकिन जो रफ़्तार उन्होंने फिल्म के दूसरे हॉफ में पकड़ी है वही तेजी वो फिल्म के पहले हिस्से में दिखाते तो फिल्म और अच्छी बन सकती थी।  पहला भाग बहुत ही धीमा है दर्शक को बोरियत होने लगती है। 

अगर आप इरफ़ान खान के प्रशंसक हैं तब तो आपको फिल्म देखनी ही चाहिए क्योंकि इस फिल्म में उन्होंने अभिनय तो किया ही है साथ ही सी फिल्म से ही उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में  कदम रखा है।