फिल्म "मदारी " दोपहर १२ बजे का शो, मुश्किल से १५ - २० दर्शक , वो भी इरफ़ान खान की फिल्म में। बहुत अफ़सोस की बात है. अभी कोई अश्लील संवादों वाली हास्य फिल्म होती तो शायद दर्शक भरे होते थियेटर में। ये सब देख कर लगता है कि सच में देश सो ही रहा है.
"मदारी -- शि....... देश सो रहा है " यह टैग लाइन है फिल्म "मदारी" की। सच में देश सो रहा है कितने लोग ऐसे ही मर जाते हैं , पुल गिर जाता है , राह में चलते आम आदमी का अपहरण हो जाता है, हत्या हो जाती है, ट्रेन ब्लास्ट हो जाता है, लोग मर जाते हैं ,ऐसे हादसे में जिस घर का व्यक्ति मरता है बस उसी पर दुखों का पहाड़ टूट जाता है। बाकि तो सारा देश वैसे ही चलता रहता है जैसे पहले चलता था। कोई खबर लेने वाला नही सबकी दुकान पहले की तरह चलती रहती है।
आम इंसान जिसके वोट के सहारे देश के राजनिति चलती है , सत्ता में बैठ कर मंत्री अपना घर भरते रहते हैं ऐसे में वो आम इंसान क्या करे जिसका बच्चा , पति , पत्नी किसी हादसे का शिकार हो जाये और सरकार मरने वाले की कीमत या मुआवज़ा देकर उसके परिवार वालों को चुप बैठने पर मजूबर कर देती है। फिर सोते हुए देश को जगाने के लिए आम इंसान वो ही करता है जो कि फिल्म में निर्मल कुमार (इरफ़ान खान ) ने किया। जिस दर्द से वो गुज़रता है वही दर्द वो देश के गृह मंत्री को देता है।
इरफ़ान कैसे कलाकार हैं यह किसी को भी बताने की जरूरत नही है , निर्देशक निशिकान्त कामत ने शैलजा केजरीवाल की कहानी को अच्छा बनाने की कोशिश की है लेकिन जो रफ़्तार उन्होंने फिल्म के दूसरे हॉफ में पकड़ी है वही तेजी वो फिल्म के पहले हिस्से में दिखाते तो फिल्म और अच्छी बन सकती थी। पहला भाग बहुत ही धीमा है दर्शक को बोरियत होने लगती है।
अगर आप इरफ़ान खान के प्रशंसक हैं तब तो आपको फिल्म देखनी ही चाहिए क्योंकि इस फिल्म में उन्होंने अभिनय तो किया ही है साथ ही सी फिल्म से ही उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा है।


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