बेमज़ा है फिल्म "डेज ऑफ तफ़री". सबसे पहले तो फिल्म का नाम ही ग़लत लिखा है तफ़री नही होता बल्कि "तफ़रीह" होता है जिसका मतलब होता है सैर -- सपाटा। खैर अगर "तफ़रीह" भी रख लेते तो क्या उखाड़ लेते निर्देशक कृष्णदेव याज्ञनिक क्योंकि फिल्म युवाओं को ध्यान में रख कर बनाई है लेकिन सारी की सारी फिल्म बकवास है। युवाओं का मतलब अपने फोन में पापा का नाम बाप रखना , पापा का फोन आने पर कोसना की बाप को किसने बनाया ? उनका फोन नही उठाना और भी क्या - क्या और सुबह होने पर उसी बाप से पैसे माँगना , पढ़ाई छोड़ कर बाकी सारी अश्लील हरकतें करना। शराब पीना , लड़की को बहुत ही गन्दी नज़रों से देखना और हर दूसरे सीन में बस वॉशरूम में सू सू कम्पटीशन।
निर्देशक कृष्णदेव याज्ञनिक ने यह फिल्म "छेल्लो दिवस " नाम गुजराती फिल्म की रिमेक बनाई है लेकिन यह जरूरी नही कि जो निर्देशक प्रादेशिक फिल्म अच्छी बनाये वो हिंदी फिल्म भी अच्छी बनायें। इस फिल्म को हास्य फिल्म कह कर प्रचारित किया जा रहा है लेकिन एक भी सीन ऐसा नही है जिसमें किसी को भी दर्शक को हंसी आयी हो। जबकि परदे पर सभी कलाकार ज़ोर ज़ोर से हंस रहे थे।
निर्माता रश्मि शर्मा एक ओर तो "पिंक " जैसी फिल्म बना रही है वहीँ दूसरी ओर "डेज ऑफ तफ़री" फिल्म भी बना रही हैं।
कल रात पी वी आर आइकॉन में "डेज ऑफ तफ़री" का शानदार प्रीमियर हुआ जिसमें मुम्बई के करीब ४०० कॉलेज के छात्र इसमें शामिल हुए। बॉलीवुड के इतिहास में ऐसा पहली ही हुआ है जिसमें रेड कार्पेट पर इतनी बड़ी संख्या में छात्र फिल्म के कलाकारों के साथ चलें।
यह सब तो ठीक है लेकिन अगर निर्देशक फिल्म बनाने में थोड़ा सा ध्यान देते तो दर्शक यह फिल्म पूरी देखते ना कि बीच में छोड़ कर "तफ़रीह" निकल जाते।

