गुरुवार, 22 सितंबर 2016

बेमज़ा है फिल्म "डेज ऑफ तफ़री"

बेमज़ा है फिल्म "डेज ऑफ तफ़री". सबसे पहले तो फिल्म का  नाम ही ग़लत लिखा है तफ़री नही होता बल्कि "तफ़रीह" होता है जिसका मतलब होता है सैर -- सपाटा। खैर अगर  "तफ़रीह" भी रख लेते तो क्या उखाड़ लेते निर्देशक कृष्णदेव याज्ञनिक क्योंकि फिल्म युवाओं को ध्यान में रख कर बनाई है लेकिन सारी की सारी फिल्म बकवास है। युवाओं का मतलब अपने फोन में पापा का नाम बाप रखना , पापा का फोन आने पर कोसना की बाप को किसने बनाया ? उनका फोन नही उठाना और भी  क्या - क्या और सुबह होने पर उसी बाप से पैसे माँगना , पढ़ाई छोड़ कर बाकी सारी अश्लील हरकतें करना।  शराब पीना , लड़की को बहुत ही गन्दी नज़रों से देखना और हर दूसरे सीन में बस वॉशरूम में सू सू कम्पटीशन।  

निर्देशक कृष्णदेव याज्ञनिक ने यह फिल्म "छेल्लो दिवस " नाम गुजराती फिल्म की रिमेक बनाई है लेकिन यह जरूरी नही कि जो निर्देशक प्रादेशिक फिल्म अच्छी बनाये वो हिंदी फिल्म भी अच्छी बनायें।  इस फिल्म को हास्य फिल्म कह कर प्रचारित किया जा रहा है लेकिन एक भी सीन ऐसा नही है जिसमें किसी को भी दर्शक को हंसी आयी हो। जबकि परदे पर सभी कलाकार ज़ोर ज़ोर से हंस रहे थे। 

निर्माता रश्मि शर्मा एक ओर तो  "पिंक " जैसी फिल्म बना रही है वहीँ दूसरी ओर "डेज ऑफ तफ़री" फिल्म भी बना रही हैं। 
 कल रात पी वी आर आइकॉन में  "डेज ऑफ तफ़री" का शानदार प्रीमियर हुआ जिसमें मुम्बई के करीब ४०० कॉलेज के छात्र इसमें शामिल हुए।  बॉलीवुड के इतिहास में ऐसा पहली ही हुआ है जिसमें रेड कार्पेट पर इतनी बड़ी संख्या में छात्र फिल्म के कलाकारों के साथ चलें। 

यह सब तो ठीक है  लेकिन अगर निर्देशक फिल्म बनाने में थोड़ा सा ध्यान देते तो दर्शक यह फिल्म पूरी देखते ना कि बीच में छोड़ कर "तफ़रीह" निकल जाते। 

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

एक्शन पसन्द हैं तो देखें अकीरा

akira.jpgआज रिलीज़ हुई  फिल्म है "अकीरा " - संस्कृत में अकीरा का अर्थ होता है "शक्ति " . फिल्म की शक्ति, अकीरा शर्मा यानि सोनाक्षी सिन्हा ने काम अच्छा किया है एक्शन भी अच्छे किये हैं। उसके पास सारी शक्तियाँ हैं लेकिन फिर भी "अकीरा " को फिल्म में और "अकीरा" फिल्म को वो सफलता हासिल नही होती जो कि होनी चाहिये।  

२०११ में रिलीज़ हुई तमिल फिल्म " मौनारगुरु " की रिमेक फिल्म "अकीरा" में निर्देशक ए आर मुरुगदास वो कमाल नही दिखा पाये जो की उन्होंने गज़नी और हॉलिडे  में दिखाया था।  भरपूर एक्शन वाली इस फिल्म में एक्शन तो हैं लेकिन महिला प्रधान फिल्म होने के बावजूद इमोशन कुछ कम है।  कोंकणा सेन ने हमेशा की तरह अच्छा काम किया है।
  निर्माता  - निर्देशक अनुराग कश्यप फिल्मों में अभिनय करने  के लिये ही मुम्बई आये थे। इस फिल्म में वो जब - जब परदे पर आये अच्छे लगे, एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी की भूमिका अच्छे से निभायी है । हालांकि फिल्म का नाम "अकीरा" है सोनाक्षी मुख्य किरदार  में हैं लेकिन बावजूद इसके अनुराग ही पूरी फिल्म में छाये रहे एक तरह से कह सकते हैं यह फिल्म अनुराग की ही फिल्म है.

अगर  आप एक्शन फ़िल्में देखने  के शौक़ीन हैं तो आपको यह फिल्म पसन्द आयेगी।  फिल्म में गीत - संगीत, रोमांस बिलकुल भी नही है और फिल्म  इसकी जरूरत  भी नही महसूस  हुई.   

ब्लॉक बस्टर तो नही होगी यह फिल्म लेकिन हो सकता है कोई बड़ी फिल्म के न होने की वजह से शायद थोड़ी सफलता हासिल कर ले।   


वाकई में ये तो टू मच ही हो गया

 फिल्म है " ये तो टू मच हो गया " निर्माता अली उनवाला और निर्देशक अनवर खान की इस फिल्म को देखकर सच में यही लगा कि वाकई में ये तो टू मच ही हो गया है।  जिम्मी शेरगिल की दोहरी भूमिका और अरबाज़ खान की भाई की भूमिका भी फिल्म को बचा नही पायी। क्योंकि फिल्म को बनाने के बाद निर्देशक ने एक भी बार फिल्म को सही से देखा नही अगर देखते तो शायद फिल्म का यह हश्र नही होता। 

गूगल , फेसबुक और सेल्फ़ी जैसी आज की लोकप्रिय बातें दिखाने वाले निर्देशक अभी भी ७० के दशक की कहानी पर अटके हुए हैं एक भाई मन शहर जाता है जबकि दूसरा भाई मोहन गाँव में है वो सब कुछ करता है बस कोई नौकरी नही करता।  फिल्म की  हीरोईन फिर भी उससे शादी करने के लिए उतावली और हीरो की माँ कहीं भी अपनी छड़ी लेकर अपने बेटे को पीटने लगती है।  अरबाज़ खान सूट - बूट में अच्छे लगे हैं मगर  वो भाई  कहीं से भी नही लग रहे। पूजा और ब्रूना दोनों ही साधारण हैं। 

फिल्म में सभी कुछ टू मच है लेकिन फिर भी दर्शकों को बांधे रखने में सक्षम नही है।  गीत - संगीत , संवाद कुछ भी अच्छा नही है। आज जबकि जिमी की फ़िल्में सफल हो रही हैं उसका भी फायदा नही उठा सकें निर्देशक अनवर खान। 

इससे ज्यादा फिल्म के बारें में लिखना भी टू मच हो जायेगा।