फिल्म है " ये तो टू मच हो गया " निर्माता अली उनवाला और निर्देशक अनवर खान की इस फिल्म को देखकर सच में यही लगा कि वाकई में ये तो टू मच ही हो गया है। जिम्मी शेरगिल की दोहरी भूमिका और अरबाज़ खान की भाई की भूमिका भी फिल्म को बचा नही पायी। क्योंकि फिल्म को बनाने के बाद निर्देशक ने एक भी बार फिल्म को सही से देखा नही अगर देखते तो शायद फिल्म का यह हश्र नही होता।
गूगल , फेसबुक और सेल्फ़ी जैसी आज की लोकप्रिय बातें दिखाने वाले निर्देशक अभी भी ७० के दशक की कहानी पर अटके हुए हैं एक भाई मन शहर जाता है जबकि दूसरा भाई मोहन गाँव में है वो सब कुछ करता है बस कोई नौकरी नही करता। फिल्म की हीरोईन फिर भी उससे शादी करने के लिए उतावली और हीरो की माँ कहीं भी अपनी छड़ी लेकर अपने बेटे को पीटने लगती है। अरबाज़ खान सूट - बूट में अच्छे लगे हैं मगर वो भाई कहीं से भी नही लग रहे। पूजा और ब्रूना दोनों ही साधारण हैं।
फिल्म में सभी कुछ टू मच है लेकिन फिर भी दर्शकों को बांधे रखने में सक्षम नही है। गीत - संगीत , संवाद कुछ भी अच्छा नही है। आज जबकि जिमी की फ़िल्में सफल हो रही हैं उसका भी फायदा नही उठा सकें निर्देशक अनवर खान।
इससे ज्यादा फिल्म के बारें में लिखना भी टू मच हो जायेगा।
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