सोमवार, 18 सितंबर 2017

अलग विषय पर बनी है फिल्म ,इसलिए देख सकते हैं -- लखनऊ सेन्ट्रल

थैंक्स माँ, ना जाने कहाँ आयी है,पटियाला हॉउस, डी  डे, हीरो और कट्टी बट्टी आदि फिल्मों में सहायक निर्देशक के रूप में काम करने वाले रंजीत तिवारी की पहली निर्देशित फिल्म है "लखनऊ सेन्ट्रल" . थियेटर में ७० प्रतिशत दर्शकों की  सँख्या देखकर यह समझ नहीं आया कि फ़रहान अख्तर के प्रशंसक भी हैं या फिर कंगना की फिल्म "सिमरन" की वजह से दर्शक यह फिल्म देखने आये थे. खैर वजह जो भी हो। 
 मुरादाबाद की जेल से लखनऊ की जेल में लाये गये किशन  मोहन गिरहोत्रा ( फ़रहान अख़्तर ) की कहानी है फिल्म "लखनऊ सेन्ट्रल ". किसी की हत्या किये बिना ही हत्या की सज़ा काट रहे किशन  जेल से भागने के लिये पाँच कैदियों का एक बैंड बनाता है लेकिन आखिरी में भागता नहीं बल्कि अपने बैंड के साथियों के साथ दिक्कत अंसारी ( इनामुलहक ) विक्टर चट्टोपाध्याय (दीपक डोबरियाल ) पुरुषोत्तम पंडित ( राजेश शर्मा ) परमिंदर ( गिप्पी ग्रेवाल ) के साथ शानदार परफॉर्म करता है और सबकी तारीफ़ों का हक़दार बनता है. 
  जिस झूठी गवाही से किशन  को उम्र कैद और फिर फाँसी की सज़ा सुनाई  गयी थी। बाद में  एन  जी ओ में काम करने वाली  गायत्री कश्यप ( डायना पेंटी ) की मदद से झूठा गवाह सच बोलता है जिससे  किशन रिहा हो जाता है। 
फिल्म का  पहला भाग धीमा है बोरियत होने लगती है जबकि दूसरा भाग दर्शकों में बाँधने में सफल होता है।  कुछ - कुछ खामियाँ हैं फिल्म में , लेकिन फिर भी अलग विषय पर बनी है फिल्म ,इसलिए देख सकते हैं।  रवि किशन और रॉनित रॉय के साथ - साथ सभी ने अच्छा काम किया है ।  फ़रहान के साथ उनके जेल के सभी साथियों ने अच्छा काम किया है।   
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