मंगलवार, 19 जनवरी 2021

फिल्म "कागज़ " में कुछ अगर कुछ देखने लायक है तो वो हैं पंकज त्रिपाठी

 हिंदी फिल्म -- कागज़
रिलीज़ ---  ज़ी ५ पर
लेखन और निर्देशन  -- सतीश कौशिक
निर्माता --  सलमान खान , निशांत कौशिक , विकास मालू  
कलाकार -- पंकज त्रिपाठी , मोनल गज्जर ,सतीश कौशिक
संगीत -- प्रवेश मल्लिक , राहुल जैन

कागज़ की अहमियत हमारे जीवन में क्या है ? यह बात हमें तब पता चलती है जब हम सरकारी काम से किसी दफ्तर में जाते हैं। अगर सरकारी कागजो में जीवित इंसान भी मरा हुआ दिखाई दे तो सोचिये उस व्यक्ति के जीवन में कितना उथल - पुथल होगा। यह फिल्म "कागज़" भी एक सच्ची कहानी पर आधारित है।  यह कहानी है उस लाल बिहारी मृतक नाम के व्यक्ति की। जिसने  18 साल के लंबे संघर्ष के बाद खुद को जीवित साबित किया।

कहानी-- उत्तर प्रदेश के खलीलाबाद के एक छोटे से गाँव में रहने वाला भरत लाल ( पंकज त्रिपाठी ) एक बैंड मास्टर है।  वो अपनी छोटी सी दुनियाँ में खुश हैं। भरत लाल की पत्नी रुक्मणि (मोनल गज्जर )  उस अपना काम बढ़ाने के लिए बैंक से लोन लेने के कहती है।  पत्नी की बात सुनकर भरत लाल  बैंक जाता है, जहाँ उसे पता चलता है अगर उसके नाम कोई जमीन है तो उसे गिरवी रख कर बैंक उसे कर्ज दे सकता है। यह सुनकर वो बहुत खुश होता है और अपने पुश्तैनी जमीन के कागज़ लेने अपने गाँव जाता है जहाँ  उसे पता चलता है कि उसके चाचा , चाची ने उसे मरा हुआ घोषित कर उसकी जमीन अपने बेटों के नाम लिखवा ली है। जब वो  लेखपाल के पास जाता है तब उसे पता चलता है कि कागज़ो में तो कब का मर चुका है बस यही से अपने को जीवित साबित करने का उसका संघर्ष शुरू हो जाता है। इस बीच उस पर बहुत कुछ गुजरता है।  भरत लाल को १८ साल लग जाते हैं इस साबित करने में कि वो जिन्दा है मरा नहीं। 

समीक्षा --- फिल्म की कहानी "कागज़ "  में तो बहुत ही मार्मिक लगती है। उस व्यक्ति के प्रति भी सहानुभूति होती है जिसकी जिंदगी में यह भूचाल आया कि जिन्दा होते हुए भी उसे साबित करना पड़ा कि वो जिन्दा है लेकिन फ़िल्म में यह कहीं भी महसूस नहीं होता।  कहीं भी आँखे नम नहीं होती , दिल में दर्द नहीं होता क्योंकि निर्देशन में बहुत कमियाँ हैं।" तेरे नाम" जैसी सुपर हिट  फिल्म बनाई थी सतीश कौशिक ने लेकिन फिल्म "कागज़ " के प्रति उनसे न्याय नहीं हो पाया है।  बहुत धीमी फिल्म है , इसलिए बहुत बढ़ी फिल्म लगती है। बीच बीच में सतीश कौशिक की कमेंट्री बहुत बोर करती है। हाँ फिल्म में अगर कुछ देखने लायक है तो वो हैं पंकज त्रिपाठी। उन्हें देखना अच्छा लगता है। हमेशा की तरह शानदार अभिनय किया है उन्होंने साथ में उनकी पत्नी बनी मोनल ग़ज़्ज़र ने भी अच्छा काम  किया है। 
 

सोमवार, 11 जनवरी 2021

कैसे एक कलाकार और एक निर्देशक एक दूसरे की बेइज्जती करते हैं यह देखना हो तो यह फिल्म अवश्य देखें -- "एके वर्सेज एके"

हिंदी फिल्म  -- एके वर्सेज एके 
रिलीज़ -- नेट फ्लिक्स पर 
निर्माता -- दीपा डे मोटवाने 
निर्देशक -- विक्रमादित्य मोटवानी 
संवाद -- अनुराग कश्यप 
स्क्रीन प्ले -- अविनाश सम्पत , विक्रमादित्य मोटवानी 
कहानी --  अविनाश सम्पत
कलाकार -- अनिल कपूर , अनुराग कश्यप , सोनम कपूर , हर्षवर्धन कपूर 

"एके वर्सेज एके" यह फिल्म नेट फ्लिक्स पर रिलीज़ हो चुकी है। इस फिल्म की ख़ास बात यह है कि इस फिल्म में हर किसी ने अपना असली किरदार अभिनीत किया है यानि अनिल कपूर अनिल कपूर ही बने हैं और निर्देशक अनुराग कश्यप निर्देशक अनुराग कश्यप ही बने हैं। फिल्म के अंदर एक फिल्म जो चल रही है उसकी कहानी है अभिनेता अनिल कपूर की।  कई साल पहले निर्देशक अनुराग कश्यप अभिनेता अनिल कपूर को लेकर एक फिल्म "आल्विन कालीचरण " बनाना चाहते  थे लेकिन अनिल कपूर की वजह से उनकी यह फिल्म बन नहीं सकी क्योंकि अनिल कपूर उनके साथ काम नहीं करना चाहते थे , तो इसका बदला लेने के लिये वो अनिल कपूर की बेटी अभिनेत्री सोनम कपूर का अपहरण कर लेते हैं अब अनिल कपूर के पास १०  घंटे का वक्त का है अपनी बेटी को ढूँढने का। अब अनिल कपूर अपनी बेटी को बौखलाये सब जगह ढूँढ़ते हैं वो सब अनुराग की सहायक योगिता सब अपने कैमरे में रिकॉर्ड कर रही है।  

समीक्षा -- यह अलग तरह की फिल्म है यानि फिल्म में सब कुछ वास्तविक है। इस तरह की फ़िल्में आम तौर पर हमारे यहाँ नहीं बनती ,तो कह सकते हैं कि अलग तरह का एक प्रयोग है फिल्म बनाने का। लेकिन फिल्म देखने में जरा भी मज़ा नहीं आता। कुछ अगर अच्छा है फिल्म में तो वो हैं अनिल कपूर। उन्हें हर फ्रेम में देखना अच्छा लगता है। अनुराग कश्यप भी ठीक ही लगे हैं।  अनिल के बेटे हर्षवर्धन ने बहुत ही बुरा अभिनय किया है। उन्हें बस गाली देने के लिए ही लाया गया है फिल्म में।  सोनम कपूर का कुछ काम नहीं था फिल्म मे।  कैसे एक कलाकार और एक निर्देशक एक दूसरे की बेइज्जती करते हैं यह देखना हो तो यह फिल्म अवश्य देखें।