सोमवार, 25 मई 2015

फिल्म "तनु वेड्स मनु रिटर्न्स " -- दत्तो है आज के ज़माने की लड़की

फिल्म 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स" सही मायने में सन २०११ की सुपर हिट फिल्म "तनु वेड्स मनु " की सीक्वेल है।  क्योंकि इस फिल्म की कहानी वही से शुरू होती है जहाँ पिछली फिल्म खत्म हुई थी. हास्य और ड्रामा से भरपूर फिल्म इस फिल्म में जहाँ दर्शकों को भरपूर हँसने का मौका है वहीँ दत्तो ( दोहरी भूमिका कंगना की ) में गज़ब का आत्म विश्वास देखने को मिलता है। कंगना तो इस समय अपने अभिनय की उस मुकाम पर हैं जहाँ वो अकेले ही फ़िल्में चलाने में माहिर हो गयी हैं। 

क्या कभी किसी भी सोचा था कि कंगना की महिला प्रधान फ़िल्में एक के बाद एक आयेगीं और वो सफल भी होंगी। लेकिन अभी  हम यहाँ बात कर रहे हैं फिल्म "तनु वेड्स मनु रिटर्न्स " की. तो सब कुछ अच्छा है फिल्म में जहाँ तनु चंचल है अपने में मस्त है वहीँ मनु बहुत ही शांत हैं और दत्तो आज के ज़माने की लड़की है जो अपने बल पर कुछ भी करने की तमन्ना रखती है. राजा अवस्थी फिल्म में पहले फिल्म की बजाय काफी शांत है.  पप्पी केहिस्से में ज्यादा संवाद है। 

चिंटू ( मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब ) तनु का नया प्रेमी है। दत्तो के भाई के रूप में  (राजेश शर्मा ) ने भी प्रभावित किया है। लेखक हिमांशु शर्मा और निर्देशक आनंद रॉय ने सभी से अच्छा काम लिया है 

कुल मिलाकर इस सप्ताह दर्शकों के लिये अच्छी फिल्म है 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स" जिसे पूरा परिवार एक साथ मिलकर देख सकता है और हंस सकता है बगैर एक दूसरे से आँखे चुराते हुए। अभी तक कैमरे से कबूतर निकलता हुआ सुना था लेकिन इस फिल्म में दत्तो (कंगना ) के हाथ से कई कबूतर उड़ते दिखाई दिए हैं।  

आप भी इस फिल्म को देखें और बताइये आपको कैसी लगी ?





सोमवार, 18 मई 2015

मुंबई के विकास की कहानी बॉम्बे वेलवेट

निर्देशक @अनुराग कश्यप की फिल्म #बॉम्बे वेलवेट के बारें में बहुत सी बातें सुनने को मिलीं।  जिसमें से अच्छी कम बुरी ज्यादा थी।  मैं भी बेमन से इस फिल्म को देखने गयी। देखने इसलिए गयी क्योंकि यह फिल्म अनुराग कश्यप द्वारा निर्देशित थी तो उत्सुकता तो थी ही। 

जब तक फिल्म की कहानी बनी यानि हीरो - हीरोइन छोटे थे फिल्म जरूर नीरस लग रही थी लेकिन जैसे ही  रणबीर कपूर परदे पर आये फिल्म में जान आ गयी शुरू से लेकर आखिरी तक उनका अभिनय लाजवाब रहा।  

  लेखक @ज्ञान प्रकाश की किताब "मुंबई फैबल्स " पर आधारित इस फिल्म में बड़े ओहदों पर बैठे अफसर, नेता, पुलिस अधिकारी और अखबारों के एडिटर कैसे - कैसे जोड़ तोड़ करते हैं और किस हद तक नीचे गिर जाते हैं।  इस फिल्म में  पांचवे और छठे दशक का  बॉम्बे दिखाया गया है। फिल्म में जोड़ तोड़ , गलत तरीके से अपना काम निकालना यह सब है। छोटी - छोटी चोरी करते - करते बलराज से जॉनी बने ( रणबीर कपूर ) और जैज गायिका रोज़ी (अनुष्का ) के प्यार की कहानी के साथ - साथ मुंबई के विकास की कहानी भी है कि कैसे मिल मजदूरो के कब्रिस्तान पर मुंबई की बड़ी- बड़ी इमारतें बनी।  बहुत कुछ सच्ची घटनाओं से प्रेरित भी है फिल्म। सच्चाई हमेशा कड़वी होती है तो कई बार फिल्म नीरस भी हो जाती है। 

एक खलनायक के रूप में @करन जौहर ने अच्छा काम किया है। आखिरी का एक संवाद जिसमें वो जॉनी से कहते हैं "तूने रोज़ी में ऐसा क्या देखा जो मुझमें नही है"  इसे सुनकर दर्शक बहुत जोर - जोर से हंस रहे थे. अनुष्का का काम भी अच्छा था लेकिन मुझे एक बात समझ नही आयी रोज़ी के किरदार के लिये उन्होंने अपने होठों के साथ खिलवाड़ क्यों किया। के के मेनन (पुलिस अफसर ) सत्यदीप मिश्रा (बलराज का दोस्त - चिमन ) सभी का काम अच्छा था। 

बुरा था कि सब कुछ दिखाने के चक्कर में फिल्म बड़ी बन गयी, कुछ छोटी हो जाती तो फिल्म से नीरसता चली जाती और दर्शक ज्यादा आनंद उठा पाते और फिल्म के निर्माता भी अपनी लागत निकाल पाते।   

सोमवार, 11 मई 2015

क्यों देखें फिल्म #पीकू

क्यों देखें फिल्म #पीकू क्योंकि इस फिल्म में अमिताभ बच्चन हैं और आप बच्चन साहब के प्रशंसक हैं  तब तो आप को इस फिल्म को देखना ही चाहिये। साथ ही ख़ूबसूरती से फिल्माये गये पिता और बेटी के खूबसूरत रिश्तों को देखना चाहते हैं।  

शुरू से आखिरी तक फिल्म में बच्चन ही बच्चन हैं।  फिल्म की कहानी देखें तो 
बस कब्ज़ पर आधारित है।  करीब ७० साल के भास्कोर बनर्जी को कब्ज़ की बिमारी है वो सारी फिल्म में इसी के बारें में बात करते हैं  उनके घर में बस इसी के बारें में बातें होती हैं। 

हास्य और भरपूर ड्रामा है फिल्म में। कुछ इमोशनल सीन भी हैं फिल्म में,  जो आँखे नम कर जाते हैं।  लेकिन कुछ ऐसी बातें भी फिल्म में जिसके लिये मन नही मानता की कोई पिता अपनी बेटी के बारें में इतना खुल कर बोल सकता है कि उसकी बेटी वर्जिन नही है वो भी किसी दूसरे पुरुष के सामने।  

दीपिका और इरफ़ान का काम अच्छा है जितना भी उनके हिस्से में आया है। फिल्म के निर्माता - निर्देशक इस फिल्म का नाम 'भेजा फ़्राय -३'  भी रखते तो ज्यादा अच्छा होता।  
फिल्म 'आनंद' में भी अमिताभ बच्चन का नाम भास्कर बनर्जी था।