वज़ीर का जितना महत्व बादशाह के दरबार में होता है उतना ही शतरंज के खेल में भी. वैसे तो हर खेल में दिमाग की जरूरत होती है लेकिन शतरंज के खेल में तो दिमाग के बिना एक प्यादा भी आगे नही बढ़ाया जा सकता है। फिल्म "वज़ीर" में भी निर्देशक बिजॉय नाम्बियार ने कहीं तो अपने दिमाग का इस्तेमाल बहुत ही उम्दा किया है और कहीं तो ऐसा इस्तेमाल किया है कि दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाता है।
अमिताभ बच्चन और फ़रहान अख्तर दोनों ने ही शानदार काम किया है। इसके अलावा जिसके हिस्से जितना काम आया है सभी ने उसे अच्छी तरह निभाया है जैसे --अदिति राव ह्याद्रि , जॉन अब्राहम , नील नितिन मुकेश। संगीत अच्छा है लेकिन धुनें सारी पुरानी है।
फिल्म दर्शकों को शुरू से आखिरी तक बांधे रखती है आँखे भी कई बार नम होती हैं। जब तक दर्शक फिल्म को देखते हैं तब तक तो सब ठीक है लेकिन जब दर्शक अपने दिमाग का इस्तेमाल करने लगते हैं फिल्म में कई सारी कमियाँ निकल आती हैं. ऐसा नही है कि खामियाँ केवल एक्शन और हास्य फिल्मों में ही होती हैं बल्कि दिल को छू लेने वाली संवेदन शील फिल्मों में भी होती है जैसा कि इस फिल्म में भी हुआ है.
अगर आप संवेदन शील फिल्मों को देखना पसंद करते है तो निस्संदेह आपको इस फिल्म को देखना ही चाहिये बस एक सलाह है दिमाग का इस्तेमाल न करें।
अगर आप संवेदन शील फिल्मों को देखना पसंद करते है तो निस्संदेह आपको इस फिल्म को देखना ही चाहिये बस एक सलाह है दिमाग का इस्तेमाल न करें।
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