हिंदी फिल्म -- हसीन दिलरुबा
ओ टी टी -- नेटफ्लिक्स
बैनर -- कलर येलो प्रोडक्शंस , टी सीरीज , इरोज एंटरनेशनल
निर्माता -- आनंद एल राय , हिमांशु शर्मा , भूषण कुमार , कृष्ण कुमार
निर्देशक: विनिल मैथ्यू
लेखिका-- कनिका ढिल्लों
कलाकार: तापसी पन्नू, विक्रांत मैसी, हर्षवर्धन राणे, आदित्य श्रीवास्तव, दया शंकर पांडे, यामिनी दास आदि
संगीत - अमित त्रिवेदी
कहानी --
२ घंटे १५ मिनट की अवधि वाली इस फिल्म " हसीन दिलरुबा " की कहानी घूमती है रानी के चारों ओर। रानी जो कि बहुत ही खूबसूरत, हसीन और जवान लड़की है। उसे क्राइम और थ्रिलर उपन्यास पढ़ना बहुत पसंद है। उस पर अपने ही पति रिशु के कत्ल का इल्जाम है। लेकिन जैसे-जैसे पुलिस की जांच आगे बढ़ती है और उसकी शादीशुदा जिंदगी के कई राज खुलते जाते हैं जिससे मामला और भी उलझता जाता है। शुरू में जहाँ पुलिस को रानी का यह केस बहुत ही साधारण लग रहा था वहीं अब उसकी जिंदगी की पेचीदगियों से यह और भी उलझता जाता है। क्या रानी ही जिम्मेदार है अपने पति की हत्या की ?
समीक्षा ---
दिल्ली की रहने वाली रानी कश्यप (तापसी पन्नू ) एक आधुनिक लड़की है। उसे लेखक दिनेश पंडित के एक्शन और थ्रिलर उपन्यास पढ़ना बहुत पसंद है। उपन्यासों की तरह ही उसे अपनी जिंदगी में भी भरपूर रोमांस और रोमांच चाहिये। जबकि उसकी शादी एक सीधे सादे से ऋषभ सक्सेना ( विक्रांत मैसी ) से हो जाती है, जो कि ज्वालापुर के बिजली विभाग में इंजीनियर है जिसकी जिंदगी बहुत ही साधारण है लेकिन रानी को अपने पति से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें हैं। उनकी शादी हुए कुछ अरसा ही हुआ है तभी उनके घर में ऋषभ का कजिन नील (हर्षवर्धन राणे) आता है। नील देखने में आकर्षक है। बस रानी नील की तरफ आकर्षित हो जाती है और दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाते हैं या यूँ कहें तो रानी को नील से प्यार हो जाता है जबकि नील तो बस अपनी इच्छाओं को पूरा कर रहा था। रानी जिसे चाय भी बनानी नहीं आती ऐसे में प्यार में अंधी वो नील के लिए नॉन वेज खाना भी यू ट्यूब देख कर बनाती है। रानी नील के साथ अपनी जिंदगी के सपने देखने लगती है। जबकि नील मौका देखकर चुपचाप रानी को बिना बताये ज्वालापुर से चला जाता है, या यूँ कहें भाग जाता है।
दिल्ली की रहने वाली रानी कश्यप (तापसी पन्नू ) एक आधुनिक लड़की है। उसे लेखक दिनेश पंडित के एक्शन और थ्रिलर उपन्यास पढ़ना बहुत पसंद है। उपन्यासों की तरह ही उसे अपनी जिंदगी में भी भरपूर रोमांस और रोमांच चाहिये। जबकि उसकी शादी एक सीधे सादे से ऋषभ सक्सेना ( विक्रांत मैसी ) से हो जाती है, जो कि ज्वालापुर के बिजली विभाग में इंजीनियर है जिसकी जिंदगी बहुत ही साधारण है लेकिन रानी को अपने पति से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें हैं। उनकी शादी हुए कुछ अरसा ही हुआ है तभी उनके घर में ऋषभ का कजिन नील (हर्षवर्धन राणे) आता है। नील देखने में आकर्षक है। बस रानी नील की तरफ आकर्षित हो जाती है और दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाते हैं या यूँ कहें तो रानी को नील से प्यार हो जाता है जबकि नील तो बस अपनी इच्छाओं को पूरा कर रहा था। रानी जिसे चाय भी बनानी नहीं आती ऐसे में प्यार में अंधी वो नील के लिए नॉन वेज खाना भी यू ट्यूब देख कर बनाती है। रानी नील के साथ अपनी जिंदगी के सपने देखने लगती है। जबकि नील मौका देखकर चुपचाप रानी को बिना बताये ज्वालापुर से चला जाता है, या यूँ कहें भाग जाता है।
रानी रिशु को अपने और नील के बारें में सब सच बता देती है। रिशु को नील और रानी के रिश्ते का सच जब पता चलता है तब वो बहुत परेशान हो जाता है। पहले ही रानी और रिशु के संबधं कुछ अच्छे नहीं थे और जब यह कड़वा सच उसके सामने आता है तो क्या होता है यह जानने के तो लिए आपको यह फिल्म देखनी होगी।
फ़िल्म क्यों देखें ?
विज्ञापन फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक विनिल मैथ्यू की यह फिल्म दूसरी है। इनकी पहली फिल्म " हँसी तो फँसी "( २०१४ ) में आयी थी। लोकप्रिय लेखक रोल्ड डाहल की लघु कहानी 'लैम्ब टू द स्लॉटर' से प्रेरित इस फिल्म की कहानी को लिखा है मनमर्जियाँ फेम कनिका ढिल्लन ने और इस फिल्म में भी उन्होंने काफी कुछ पिछली फिल्म "मनमर्जियाँ " से ही ले लिया है। इसलिये फिल्म में कुछ भी नया नहीं है। फिल्म को देखते समय हर बार यही लगा कि अरे यह तो पहले भी देखा है। शायद कनिका को ऐसा नहीं लगा होगा।
फिल्म की शुरुआत अच्छी है लेकिन फिर वही दोहराव दर्शकों को ज्यादा देर तक बांधे नहीं रखता। जहाँ तक कलाकारों की बात करें तो व्यक्तिगत रूप से सभी का काम अच्छा है। तापसी ने मजबूत , जिद्दी , कामुक रानी का किरदार बखूबी निभाया है। सीधे - सादे पति भूमिका में
विक्रांत मैसी ने हमेशा की तरह अच्छा अभिनय किया है। विक्रांत को भी सोच समझ कर फिल्में करनी चाहिए।
हर्षवर्धन राणे को जितना काम मिला उतना उन्होंने अच्छे से निभाया। सी आई डी फेम आदित्य श्रीवास्तव ने पुलिस अफसर का अच्छा काम किया है। रिशु की माँ की बनी यामिनी दास का काम भी अच्छा है लेकिन फिर भी फिल्म में बहुत सारी कमियाँ हैं जिससे यह फ़िल्म बहुत ही बकवास हो गई है। तापसी ने क्या सोच कर यह फिल्म की होगी।समझ नहीं आया। क्योंकि यह हसीन दिलरुबा किसी सस्ते उपन्यास की हसीन दिलरुबा सी लगती है। ऐसी दिलरुबा को अच्छे दर्शक तो बिल्कुल भी नहीं मिलेंगे।
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