सोमवार, 22 जून 2015

बड़े परदे पर डांस का रियल्टी शो --फिल्म "ए बी सी डी -२"

सिने मैक्स, वर्सोवा, मुंबई। सुबह ११. ३० का शो, सुहाना मौसम मुंबई का और टिकट खिड़की का भी,  क्योंकि अब एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग सोमवार और मंगलवार के दिन सुबह फिल्म देखने लगा है शायद इसलिये भी क्योंकि टिकट दर सस्ती होती है. इन दर्शकों में आम दर्शक ही नही होते बल्कि फिल्म और टी वी से जुडी कई जाने - माने चेहरे भी होते हैं. 

टी वी और फिल्म अभिनेत्री #अलका अमीन भी हमारे से आगे वाली लाइन में बैठी फिल्म देख रही थी. जितनी अच्छी वो परदे पर हैं उतनी ही अच्छी ही वो असली जिंदगी में भी हैं क्योंकि जब हमें हॉल सहायक की जरुरत हुई तो वो खुद उसे बुला कर लायीं, बहुत - बहुत धन्यवाद आपका।   

फिल्म की कहानी और स्टार कास्ट के हिसाब से ही पता चल जाता है कि इस फिल्म के दर्शक किस उम्र विशेष के होंगे तो जैसा अनुमान था इस फिल्म में भी युवा दर्शक ही ज्यादा थे। ७० %  सीट भरी थी तो अच्छा लगा देख कर क्योंकि "हमारी अधूरी कहानी " में तो हाल - बेहाल था। सबसे अच्छा यह था की दर्शक हर अच्छे डांस मूव को सराहा भी रहे थे।      

"अगर जो कोई संगीत महसूस कर सकता है वो नाच भी सकता है" बिलकुल सही संवाद है फिल्म "ए बी सी डी - २ " का।  लेकिन किसी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की डांस प्रतोयोगिता जीतने या जिंदगी में एक मुकाम हासिल करने के लिये समर्पण , त्याग और मेहनत की जरुरत होती है।  जिनको डांस में जरा भी रूचि है वो इस फिल्म को पसंद करेगें , हालांकि टी वी पर तो अब डांस रियल्टी शो की भरमार हो गयी है फिर बड़े परदे और थ्री डी एफ़ेक्ट के साथ इस फिल्म को देखना अच्छा लग रहा था लेकिन जितना अच्छा डांस था इस फिल्म का उतना ही अच्छा संगीत भी होता तो और अच्छा होता। 

 हालांकि फिल्म में मुख्य कलाकार वरुण धवन और श्रद्धा हैं  लेकिन  निर्देशक रेमो ने  राघव जुयल , लॉरेन गोटटलिब, धर्मेश येलांदे , पुनीत आदि सभी डांसर को पूरा मौका दिया है फिल्म में , जब भी फिल्म में डांस होता था तो ऐसा नही लगा की फिल्म का नायक वरुण हैं लगता था की एक ग्रुप परफॉर्म कर रहा है न की एक नायक या नायिका।  असली जिंदगी के २ डांसर की जिंदगी पर आधारित इस फिल्म में अगर दर्शक कहानी खोजने निकलेगें  तो कहीं भी नही दिखाई देगी उन्हें अगर डांस का लुत्फ़ उठाने जायेगे तो निस्संदेह आपको फिल्म अच्छी लगेगी।  कुछ डांस मूव तो बहुत बेहतरीन हैं जिन्हें  आप पलक बिना झपकाएँ देखेगें।  
अभिनेता वरुण धवन के बारें में सब जानते ही हैं कि वो अच्छे डांसर हैं लेकिन इस फिल्म से श्रद्धा कपूर को भी फायदा मिलेगा क्योंकि अभी तक उन्हें रोने - धोने और सीधे - सादे से ही रोल मिलें हैं लेकिन अब उन्हें फिल्म में नाचने के भी भरपूर मौके मिल सकेगें। 
बहुत सारा डांस देखना है आप जरूर जायें फिल्म #एबीसीडी - २ 


--फिल्म  "ए बी सी डी -२" 

सोमवार, 15 जून 2015

फिल्म हमारी अधूरी कहानी में कहानी अधूरी, दर्शक अधूरे और सफलता भी अधूरी

पी वी आर, सिटी मॉल, अँधेरी वेस्ट सुबह ११ बजकर १५ का शो टाइम , शो शुरू हुआ ११. ४० पर।  सबसे पीछे की २ लाइनें बिलकुल खाली।  उसके बाद हर लाइन में कुछ - कुछ कुर्सियां खाली और प्लैटिनम सीट तो बिलकुल ही खाली।  आप सोच सकते हैं कितने दर्शक होंगें थियेटर में।  लेकिन यह देख कर अच्छा लगा की दर्शक मिले जुले थे यानि सिर्फ महिलायें ही नही थी बल्कि ग्रुप में आये हुए लड़के भी थे जो कि मध्यांतर के बाद की फिल्म के संवादों पर बार - बार हंस रहे थे , जैसे तुम अपनी हवस  वासना  के लिये मेरे पास आये हो  और मैं कोई सड़क पर पड़ा हुआ सिक्का नही हूँ।  इस तरह के संवाद आज की फिल्मों में होते ही नहीं हैं तो आज की पीढ़ी लिये तो इस तरह के संवाद हास्य का विषय ही हैं दूसरे इस तरह के संवादों की जरूरत भी नही थी , खैर कई बार लगा कि #महेश भट्ट कुछ ज्यादा ही भावुक हो गये इस फिल्म के साथ तो कहानी , संवाद सब कुछ अधूरा ही हो गया , क्योंकि वो बह गये भावनाओं में। फिल्म में एक दृश्य तो बिलकुल विद्या की ही एक दूसरी फिल्म #कहानी के जैसा था. 
   
#मोहित सूरी की पिछली फिल्म #आशिक़ी - २  हालांकि हिट हुई शायद संगीत की वजह से ,लेकिन वो भी बहुत ही निराशाजनक फिल्म थी और इस फिल्म का पहला भाग भी बहुत निराशाजनक था। दूसरा भाग पहले से बेहतर था।फिल्म कभी दुबई , कलकत्ता , शिमला , बस्तर , छत्तीसगढ़ न जाने पल भर में कहाँ से कहाँ पंहुच जाती है समझ ही नही आता। 
  
गीत - संगीत भी उदास, कलाकार भी सब उदास ,  सोचा था विद्या बालन की बहुत दिनों के बाद कोई फिल्म आ रही है अच्छी होगी उसे परदे पर देखना अच्छा लगता है लेकिन निराशा ही हाथ लगी ऐसा नही है की उसने, राजकुमार राव या इमरान ने काम अच्छा नही किया हो, क्या कर सकता है कलाकार जब कहानी ही भटक जाये।

८० के दशक की कहानी प्रेम कहानी लेकिन जिसमें दर्द ही दर्द है आरव का बचपन दर्द से भरा, विद्या का वैवाहिक जीवन दर्द  भरा , दो दर्द भरे व्यक्ति आपस में मिलते हैं तो उन्हें प्यार हो जाता है कि एक दूसरे के लिये कुछ भी कर गुज़रने के लिये तैयार हो जाते हैं। कुछ संवाद दिल को छू जाते हैं प्यार में लेना देना कैसा , कब तक  प्यार में यह सौदा हो , सच्चे प्यार में सिर्फ देना ही होता है " 

परम्परा , संस्कार , सिन्दूर , मंगल सूत्र के नाम पर कब तक से जबरदस्ती बाँध कर रख सकते हैं पति अपनी पत्नियों को , पत्नी का मालिक बन कर उसके हाथ में जबरदस्ती अपना नाम लिखवाना।  वसुधा , आरव की माँ , वसुधा की सास कई महिलाओं का जीवन दिखाया है फिल्म में। 

एक बात काबिले तारीफ है इस फिल्म में , जो की आम तौर पर भट्ट कैंप की फिल्मों में होता ही नही है वैसे तो  आजकल किसी भी फिल्म में ऐसा नही होता ।  कोई अंग प्रदर्शन नही , अश्लील संवाद नही , पहले भाग में शराब का गिलास भी नही नायक के हाथों में जबकि नायक बहुत ही अमीर है।  दूसरे भाग में एक - दो पैग पीता दिखाई दिया बस तो थोड़ा आश्चर्य था लेकिन अच्छा लगा।  


रविवार, 7 जून 2015

दिल नही धड़का -- "दिल धड़कने दो" में

जोया अख्तर की ताज़ा तरीन रिलीज़ फिल्म "दिल धड़कने दो " सिने मैक्स, वर्सोवा सुबह ११ बजे का शो , जिसमें ४० % दर्शक थे।  ११ बजे का शो था लेकिन फिल्म शुरू हुई करीब ११.३० पर।  दर्शक बैचेन कब फिल्म शुरू हो , थक गये परफ्यूम , क्रीम और भी कई तरह के विज्ञापन देखकर आखिरकार  फिल्म शुरू हुई। 
फिल्म शुरू हुई एक सूत्रधार की आवाज़ के साथ जो की फिल्म की कहानी व  किरदारों परिचय कराता है , यह हैं कमल मेहरा, यह  हैं उनकी पत्नी , यह बेटा , यह बेटी, यह ये यह वो. करीब १० मिनट के बाद पता चलता है  कि कहानी सुनाने वाला मेहरा परिवार का ही कुत्ता है प्लूटो मेहरा।  इस प्लूटो की भी किस्मत खुल गयी क्योंकि इसकी आवाज़ की डबिंग की है अभिनेता आमिर खान ने।  इसने इस परिवार के सभी सदस्यों को करीब से देखा है कि कौन कैसा है ? बेजुबान होते हुए भी शुरू से अंत तक यही दर्शकों को कहानी बताता जाता है। 

क्रूज़ की सैर करने का मन हो , गॉसिप पर हंसने का मन हो या दोहरी मानसिकता देखनी हो।  अंदर से दुखी परिवार लेकिन समाज के सामने आदर्श परिवार और पति पत्नी देखने हो तो जरूर देखें यह फिल्म जिसका नाम है "दिल धड़कने दो " लेकिन फिल्म में सच कहें तो दिल कहीं भी नही धड़का , कभी धड़कन नही बढ़ी क़ि अब क्या होगा ?

ज़ोया की यह चौथी फिल्म है सबसे पहले  #लक बाय चांस # जिंदगी न मिलेगी दोबारा #बॉम्बे टाकीज़ -  शीला की जवानी और अब #दिल धड़कने दो।  इस फिल्म को देखकर ऐसा लगा की हम #करन जौहर या #सूरज बड़जात्या की कोई फिल्म देख रहे हो।  एक परिवार , उनके दोस्त , रिश्तेदार बिजनिस में घाटा , घाटे को कंट्रोल करने के लिए दोस्ती को शादी में बदलने का ड्रामा। ऐसा कहीं भी नही लगा की यह उसी निर्देशक की फिल्म है जिसने जिंदगी न मिलेगी दोबारा' बनाई थी। एक बात ओर यह भी देखना होगा कि ज़ोया पहले स्टोरी फाइनल करती है या लोकेशन क्योंकि उनकी सारी फिल्में ऐसी ही लगती हैं कि वह पहले लोकेशन स्पोंसर कराती है फिर कहानी निश्चित की जाती हैं ।  

फिल्म में हाई सोसायटी दिखाई है लेकिन फरहान अख्तर के संवाद ऐसे हैं जैसे मध्यम वर्गीय परिवार आपस में बातें करता है , उन्हें ही सबसे ज्यादा चिंता होती है समाज और लोगों की। हाई सोसायटी के लोग तो अपनी मनमानी करते हैं उन्हें कब समाज की परवाह होने लगी। ऐसे परिवार के लड़के एक डांसर से टाइम पास जरूर कर सकते हैं पर घर में नही लाते।    

 फिल्म में कुछ भावुक सीन भी हैं जिन्हें देखना अच्छा लगता है "जब सारा मेहरा परिवार एक साथ हो जाता है".  बिजनिस परिवारों में लड़का  -लड़की को बराबरी का दर्जा देने वाली बात भी अच्छी है।  #अनिल कपूर की बात आज भी निराली है , जितना जोश पहले था आज भी है , #शेफाली अच्छी अदाकारा हैं उनके कुछ सीन बेहद अच्छे हैं, #प्रिंयका और #रनवीर बहन भाई की जोड़ी अच्छी है , बाकी कलाकार जिनमे #राहुल बोस #अनुष्का , #
फ़रहान और जरीना बहाब एक्स्ट्रा जैसे लग रहे थे। 

गीत - संगीत पुराना , #शंकर #अहसान #लॉय यह क्या किया आपने, आपसे ऐसे उम्मीद नही है  
हाँ यह बात बिलकुल पक्की है कि इस फिल्म को देखकर सभी दर्शकों का क्रूज़ पर जाने का जरूर मन करेगा।  

सोमवार, 1 जून 2015

अगर दिमाग नही लगाना और थोड़ा हँसना है तो वेलकम टू कराची

इस सप्ताह रिलीज़ हुई फिल्म "वेलकम टू कराची " जिसका ट्रेलर देख कर मैं फिल्म देखने गयी थी।  "फन सिनेमा " अँधेरी वेस्ट में सुबह ११. ५० के शो में लगभग ७०% सीट भरी हुई थीं।  वैसे मैं यह फिल्म देखने सिर्फ और सिर्फ अरशद वारसी के लिये ही गयी थी ,क्योंकि उनकी पिछली फिल्म "जॉली एल एल बी"  मुझे क्या सभी को बहुत पसंद आयी थी और फिर कॉमिक सेंस की बात करें तो  उनसे तो कोई बेहतर है नहीं और वैसे भी यह फिल्म तो उनके ही भरोसे थी उनके ही कन्धों के ऊपर थी क्योंकि #जैकी भगनानी ने अभी कोई तीर तो मारा नही है। जिसकी हम उम्मीद करें।  वैसे निर्माता #वाशु भगनानी यानि जैकी के पूज्य पिताजी उन्हें १५-१७ फ़िल्में तो करवा ही सकते हैं फिर शायद उनकी गाड़ी कुछ चल निकले जूनियर बच्चन की तरह। 

लेकिन इस फिल्म में जैकी ने एक सीधे सादे #गुज़राती युवक की भूमिका अच्छी अभिनीत की है, उन्होंने गुज़राती भाषा के उच्चारण में भी काफी मेहनत की है। फिल्म का पहला भाग तो काफी कुछ ठीक है लेकिन दूसरे भाग में निर्देशक #आशीष मोहन कई बार भटक गये हैं।  कुछ संवादों में तो बहुत हंसी आती है लेकिन कई बार फिल्म इतनी बोर लगती है लगता है कि अब खत्म हो जाये तो अच्छा है ।  

#अरशद वारसी ने अच्छा अभिनय किया है उनके संवाद सुनकर हंसी आती है अगर उनका अच्छा साथ मिला होता तो शायद फिल्म और बेहतर हो सकती थी। 

जो कमाल निर्देशक ने अपनी पिछली फिल्म "खिलाडी ७८६ " (२०१२ )  में दिखाया था इस फिल्म में उनसे कुछ चूक हो गयी है। फिल्म की कहानी अच्छी शुरू हुई थी पाकिस्तान में जिस तरह से हालात हैं तालिबानी हमले और बहुत कुछ बैन वो सब बहुत अच्छा है. 

यू एस की डांसर और अभिनेत्री लॉरेन गोटिलेब  ने हमेशा की तरह अच्छा डांस किया है बाकी कुछ ज्यादा था ही नहीं उनके हिस्से में । 

लेकिन क्या सच में गुज़राती इतने सीधे कहो या बेवकूफ होते हैं जितना उन्हें इस फिल्म में दिखाया है।  इस पर कोई बहस नही क्योंकि यह तो फिल्म है हक़ीक़त नहीं। 

गीत - संगीत भी कुछ प्रभाव नही छोड़ता।  जी पर लात लगने जैसे गीत लगता है आम बात हो गयी है।  
अगर दिमाग नही लगाना और थोड़ा हँसना है तो वेलकम टू कराची .