सोमवार, 1 जून 2015

अगर दिमाग नही लगाना और थोड़ा हँसना है तो वेलकम टू कराची

इस सप्ताह रिलीज़ हुई फिल्म "वेलकम टू कराची " जिसका ट्रेलर देख कर मैं फिल्म देखने गयी थी।  "फन सिनेमा " अँधेरी वेस्ट में सुबह ११. ५० के शो में लगभग ७०% सीट भरी हुई थीं।  वैसे मैं यह फिल्म देखने सिर्फ और सिर्फ अरशद वारसी के लिये ही गयी थी ,क्योंकि उनकी पिछली फिल्म "जॉली एल एल बी"  मुझे क्या सभी को बहुत पसंद आयी थी और फिर कॉमिक सेंस की बात करें तो  उनसे तो कोई बेहतर है नहीं और वैसे भी यह फिल्म तो उनके ही भरोसे थी उनके ही कन्धों के ऊपर थी क्योंकि #जैकी भगनानी ने अभी कोई तीर तो मारा नही है। जिसकी हम उम्मीद करें।  वैसे निर्माता #वाशु भगनानी यानि जैकी के पूज्य पिताजी उन्हें १५-१७ फ़िल्में तो करवा ही सकते हैं फिर शायद उनकी गाड़ी कुछ चल निकले जूनियर बच्चन की तरह। 

लेकिन इस फिल्म में जैकी ने एक सीधे सादे #गुज़राती युवक की भूमिका अच्छी अभिनीत की है, उन्होंने गुज़राती भाषा के उच्चारण में भी काफी मेहनत की है। फिल्म का पहला भाग तो काफी कुछ ठीक है लेकिन दूसरे भाग में निर्देशक #आशीष मोहन कई बार भटक गये हैं।  कुछ संवादों में तो बहुत हंसी आती है लेकिन कई बार फिल्म इतनी बोर लगती है लगता है कि अब खत्म हो जाये तो अच्छा है ।  

#अरशद वारसी ने अच्छा अभिनय किया है उनके संवाद सुनकर हंसी आती है अगर उनका अच्छा साथ मिला होता तो शायद फिल्म और बेहतर हो सकती थी। 

जो कमाल निर्देशक ने अपनी पिछली फिल्म "खिलाडी ७८६ " (२०१२ )  में दिखाया था इस फिल्म में उनसे कुछ चूक हो गयी है। फिल्म की कहानी अच्छी शुरू हुई थी पाकिस्तान में जिस तरह से हालात हैं तालिबानी हमले और बहुत कुछ बैन वो सब बहुत अच्छा है. 

यू एस की डांसर और अभिनेत्री लॉरेन गोटिलेब  ने हमेशा की तरह अच्छा डांस किया है बाकी कुछ ज्यादा था ही नहीं उनके हिस्से में । 

लेकिन क्या सच में गुज़राती इतने सीधे कहो या बेवकूफ होते हैं जितना उन्हें इस फिल्म में दिखाया है।  इस पर कोई बहस नही क्योंकि यह तो फिल्म है हक़ीक़त नहीं। 

गीत - संगीत भी कुछ प्रभाव नही छोड़ता।  जी पर लात लगने जैसे गीत लगता है आम बात हो गयी है।  
अगर दिमाग नही लगाना और थोड़ा हँसना है तो वेलकम टू कराची .

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