सोमवार, 15 जून 2015

फिल्म हमारी अधूरी कहानी में कहानी अधूरी, दर्शक अधूरे और सफलता भी अधूरी

पी वी आर, सिटी मॉल, अँधेरी वेस्ट सुबह ११ बजकर १५ का शो टाइम , शो शुरू हुआ ११. ४० पर।  सबसे पीछे की २ लाइनें बिलकुल खाली।  उसके बाद हर लाइन में कुछ - कुछ कुर्सियां खाली और प्लैटिनम सीट तो बिलकुल ही खाली।  आप सोच सकते हैं कितने दर्शक होंगें थियेटर में।  लेकिन यह देख कर अच्छा लगा की दर्शक मिले जुले थे यानि सिर्फ महिलायें ही नही थी बल्कि ग्रुप में आये हुए लड़के भी थे जो कि मध्यांतर के बाद की फिल्म के संवादों पर बार - बार हंस रहे थे , जैसे तुम अपनी हवस  वासना  के लिये मेरे पास आये हो  और मैं कोई सड़क पर पड़ा हुआ सिक्का नही हूँ।  इस तरह के संवाद आज की फिल्मों में होते ही नहीं हैं तो आज की पीढ़ी लिये तो इस तरह के संवाद हास्य का विषय ही हैं दूसरे इस तरह के संवादों की जरूरत भी नही थी , खैर कई बार लगा कि #महेश भट्ट कुछ ज्यादा ही भावुक हो गये इस फिल्म के साथ तो कहानी , संवाद सब कुछ अधूरा ही हो गया , क्योंकि वो बह गये भावनाओं में। फिल्म में एक दृश्य तो बिलकुल विद्या की ही एक दूसरी फिल्म #कहानी के जैसा था. 
   
#मोहित सूरी की पिछली फिल्म #आशिक़ी - २  हालांकि हिट हुई शायद संगीत की वजह से ,लेकिन वो भी बहुत ही निराशाजनक फिल्म थी और इस फिल्म का पहला भाग भी बहुत निराशाजनक था। दूसरा भाग पहले से बेहतर था।फिल्म कभी दुबई , कलकत्ता , शिमला , बस्तर , छत्तीसगढ़ न जाने पल भर में कहाँ से कहाँ पंहुच जाती है समझ ही नही आता। 
  
गीत - संगीत भी उदास, कलाकार भी सब उदास ,  सोचा था विद्या बालन की बहुत दिनों के बाद कोई फिल्म आ रही है अच्छी होगी उसे परदे पर देखना अच्छा लगता है लेकिन निराशा ही हाथ लगी ऐसा नही है की उसने, राजकुमार राव या इमरान ने काम अच्छा नही किया हो, क्या कर सकता है कलाकार जब कहानी ही भटक जाये।

८० के दशक की कहानी प्रेम कहानी लेकिन जिसमें दर्द ही दर्द है आरव का बचपन दर्द से भरा, विद्या का वैवाहिक जीवन दर्द  भरा , दो दर्द भरे व्यक्ति आपस में मिलते हैं तो उन्हें प्यार हो जाता है कि एक दूसरे के लिये कुछ भी कर गुज़रने के लिये तैयार हो जाते हैं। कुछ संवाद दिल को छू जाते हैं प्यार में लेना देना कैसा , कब तक  प्यार में यह सौदा हो , सच्चे प्यार में सिर्फ देना ही होता है " 

परम्परा , संस्कार , सिन्दूर , मंगल सूत्र के नाम पर कब तक से जबरदस्ती बाँध कर रख सकते हैं पति अपनी पत्नियों को , पत्नी का मालिक बन कर उसके हाथ में जबरदस्ती अपना नाम लिखवाना।  वसुधा , आरव की माँ , वसुधा की सास कई महिलाओं का जीवन दिखाया है फिल्म में। 

एक बात काबिले तारीफ है इस फिल्म में , जो की आम तौर पर भट्ट कैंप की फिल्मों में होता ही नही है वैसे तो  आजकल किसी भी फिल्म में ऐसा नही होता ।  कोई अंग प्रदर्शन नही , अश्लील संवाद नही , पहले भाग में शराब का गिलास भी नही नायक के हाथों में जबकि नायक बहुत ही अमीर है।  दूसरे भाग में एक - दो पैग पीता दिखाई दिया बस तो थोड़ा आश्चर्य था लेकिन अच्छा लगा।  


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