शनिवार, 24 दिसंबर 2016

पहलवानी केवल छोरे ही नहीं म्हारी छोरियाँ भी कर सकती हैं

पी वी आइकॉन, वर्सोवा अँधेरी वेस्ट मुम्बई , फिल्म "दंगल "  शो टाइम शनिवार ,दोपहर ११ बजकर ३० मिनट।  पूरा थियेटर भरा हुआ दर्शकों से। ऐसा तब ही होता है जब फिल्म बहुत अच्छी हो।  इससे पहले फिल्म "क़्वीन " में ऐसा देखने को मिला था। आज सबसे अच्छी बात थियेटर में यह देखने को मिली कि जब गीता फ़ोगाट गोल्ड मेडल जीत जाती है और देश का राष्ट्रीय गीत "जन गण मन " बजता है तब फिल्म के अंदर के साथ - साथ थियेटर में भी सारे दर्शक इसके सम्मान में खड़े हो जाते हैं।  यह सच में दिल को छू लेता है।  

फिल्म "दंगल" भूतपूर्व पहलवान महावीर सिंह फोगट और उनकी बेटियाँ गीता और बबीता ( जोकि दोनों ही पहलवान हैं ) के जीवन पर आधारित है। यह फिल्म केवल रेसलिंग पर ही आधारित नही है बल्कि यह एक पिता और उसकी बेटियों के बीच के भावनात्मक सफर की कहानी है. एक ऐसा पिता जो कि अपनी बेटियों की सशक्त बनने की शिक्षा देता है और फिर  बेटियाँ किस तरह से अपने पिता की  सिखाई शिक्षा से पिता के सपनों को पूरा करती हैं। 

कुश्ती खेल पर आधारित फिल्म है लेकिन फिर भी कहीं से भी नीरस नही है दर्शको को एक भी पल ऊब नही होती और एक भी दर्शक थियेटर से बाहर नही जाता  छोटे से लेकर बड़े सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है तभी फिल्म अच्छी बनी है।  हरियाणा के छोटे से क़स्बे बिलाली से अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर रेसलिंग खेलने जाना बहुत बड़ी बात है किसी भी लड़की के लिए। हरियाणा जहाँ लड़की का जन्म लेना ही अपराध माना जाता है जहाँ सबसे ज्यादा कन्या भ्रूण हत्या होती है वहाँ की लड़की जब इस स्तर पर पँहुचती है तो खुद पर गर्व होता है कि हम भी उसी भारत देश के नागरिक हैं। 

फिल्म #दंगल जरूर जाकर देखें अच्छी फिल्म है लड़कियाँ ही नही उनके घर वाले , रिश्तेदार आस पड़ोस वाले भी समझ पायेगें कि पहलवानी केवल छोरे ही नहीं  म्हारी छोरियाँ  भी कर सकती हैं क्योंकि म्हारी छोरियाँ छोरों से कम हैं के. 

आमिर खान , साक्षी तंवर , फ़ातिमा सना शेख़ , ज़ायरा वसीम, सान्या मल्होत्रा , सुहानी भटनागर , रोहित शंकरवार ,अपारशक्ति खुराना  और निर्देशक नितेश तिवारी सभी का धन्यवाद ऐसी अच्छी फिल्म बनाने के लिये।

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

शुद्ध देसी रोमांस जैसी फिल्म देखना पसन्द करते हैं तो यह फिल्म "बेफ़िक्रे "आपके लिए ही है

पी वी आर आइकॉन , वर्सोवा अँधेरी वेस्ट ,  मुम्बई , तारीख़  ९ दिसम्बर , फिल्म "बेफ़िक्रे " शो टाइम १ बजकर २० मिनट ,   मात्र २० % दर्शकों की उपस्थिति।  आज ही रिलीज़ हुई फिल्म बेफ़िक्रे और आज ही हुआ यह हाल। ट्रेलर देखकर ही यह समझ आ गया था कि फिल्म कैसी होगी ? जहाँ से छिछोरे पन की शुरुआत होता है वहीं से समझ लीजिये यह फिल्म शुरू होती है।  फिल्म की कास्टिंग शुरू , साथ में गाना "लबों का कारोबार " शुरू साथ में करीब १० - १५ जोड़ियाँ परदे पर किस करती  हुई दिखाई देती हैं। 

हवस के पुजारियों के लिए बनाई गयी इस फिल्म की कहानी पुरानी है ऐसी कई फ़िल्में पहले भी आ चुकी हैं जिनमें नायक - नायिका यह कहते हैं कि कभी भी एक दूसरे को आई लव यू नही कहेगें लेकिन लिव इन में रहेगें।
लेकिन जब - जब अलग - अलग शादी करने जा रहे होते हैं तब आखिरी समय में उन्हें समझ आता है कि उन्हें यह शादी नही करनी क्योंकि वो तो किसी दूसरे से प्यार करते हैं और फिर उबाऊ लंबे दृश्य  और बेवकूफी भरे सीन।  

कहीं पढ़ा था कि आदित्य चोपड़ा ने अपनी और रानी की प्रेम कहानी और शादी को समर्पित की है यह फिल्म।  वाह क्या बात है इससे अच्छी फिल्म नही बना पाये अपनी और रानी की प्रेम कहानी के लिये।  

एक अच्छी प्रेम कहानी देखना चाहते हैं तो आपको यह फिल्म निराश करेगी लेकिन अगर आप को किस और सेक्स के लिए पागल जोड़े  को देखना है तो आपको पसन्द आयेगी।  आज के हमारे युवा दर्शकों को हो सकता है अच्छी लगे यह फिल्म "बेफ़िक्रे " क्योंकि उन पर पाश्चात्य देशों का प्रभाव ज्यादा हो गया है। कहानी के साथ लिप लॉक होता तो शायद फिल्म बेहतर होती।  आप शुद्ध देसी रोमांस जैसी फिल्म देखना पसन्द करते हैं तो यह फिल्म "बेफ़िक्रे "आपके लिए ही है। 

बेफ़िक्रे में रनवीर और वानी ने  इमरान हाशमी को भी पीछे छोड़ दिया है। 

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

अगर आप विद्या बालन के प्रशंसक हैं तो फिल्म देखें "कहानी २ : दुर्गा रानी सिंह

फिल्म "कहानी २ : दुर्गा रानी सिंह , दोपहर १२ बजे का शो , पी वी आर सिटी मॉल , अँधेरी वेस्ट , मुम्बई , मुश्किल से ३० के करीब दर्शक। आश्चर्य हुआ यह देखकर कि विद्या बालन की फिल्म और वो भी कहानी - २ , जिसकी पिछली फिल्म कहानी ने दर्शकों के रोयें  खड़े कर दिये थे उसकी सीक्वेल फिल्म का हश्र यह  होगा , आज चौथे दिन तक की कमाई मात्र 16.97  करोड़।  

बाल शोषण को कहानी का केंद्र बना कर बनाई गयी इस फिल्म में वो बात नही थी जो कि कहानी में थी।  अगर विद्या बालन नही होती इस फिल्म में तो शायद इतनी भी कमाई नही होती जितनी कि  हुई है। फिल्म "कहानी " में आखिरी दृश्य तक सस्पेंस बना हुआ था कि कैसे गर्भवती विद्या बागची बदला लेगी जबकि इस फिल्म में तो आधे घण्टे बाद ही दर्शकों को समझ आ गया था कि क्या होने वाला है।

निर्देशक सुजॉय ने जब फिल्म में अर्जुन रामपाल जैसे अभिनेता को कास्ट किया तो तभी समझ में आ गया  कि वो भी कुछ न कुछ तो फिल्म में करेगा ही केवल अपना चेहरा दिखाने के लिये नही है। अर्जुन ने अपना काम किया और आखिरी में हीरोइन (विद्या बालन ) की मदद की। 

दिल को छू लेने वाले विषय पर फिल्म बनानी शुरू की निर्देशक सुजॉय घोष ने  लेकिन फिर भी बहुत सी गलतियाँ की या तो यह सब ओवर कॉन्फिडेंस की वजह से हो गया कि वो और विद्या कुछ भी कर सकते हैं। कुछ दृश्यों की जरूरत नही थी जैसे इण्द्रजीत सिंह और उसकी पत्नी के सेक्स सीन और विद्या सिन्हा और उसके प्रेमी के सेक्स सीन। 

फिल्म में सभी कलाकारों ने अच्छा काम किया है अगर आप विद्या बालन के प्रशंसक हैं तो फिल्म जरूर देखें बस  है  तुलना फिल्म  "कहानी"  कदापि मत कीजियेगा नही तो आप फिल्म का आंनद नही उठा पायेगें।  

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

बेफ़िक्रे को मिला यू / ए सर्टिफिकेट

 हमारे संस्कारी बाबा पहलाज निहलानी को ये हुआ क्या ?  उन्होंने  फिल्म "बेफ़िक्रे " को यू / सार्टिफिकेट दे दिया यह कह कर कि यह फिल्म हमारी संस्कृति का हिस्सा नही है जो भी इस फिल्म में दिखाया  है कि पेरिस के युवक युवतियाँ ऐसा ही करते हैं कि हमारे देश में। जबकि सभी जानते हैं कि  इस फिल्म में २३ किसिंग सीन हैं और इस फिल्म को सार्टिफिकेट मिलना चाहिये था। इस फिल्म से पहले पहलाज निहलानी ने जेम्स बांड का किसिंग सीन भी सेंसर कर दिया था उस फिल्म की कहानी भी यहाँ की संस्कृति का हिस्सा नही थी फिर भी।  कोई तो उनसे पूछो कि यह फिल्म कहाँ दिखाई जायेगी यहाँ भारत में या पेरिस में।  क्या इस फिल्म को देखकर यहाँ के दर्शकों पर कुछ असर नही होगा ?   

सोमवार, 28 नवंबर 2016

एक अच्छी फिल्म देखना चाहते हैं तो जरूर देखें डियर जिंदगी

Image result for dear zindagiतारीख २८ नवम्बर , पी वी आर आई कॉन, वर्सोवा अँधेरी,  सोमवार - शो टाइम दोपहर : ११ बजकर ४५ मिनट।  फिल्म शुरू हुई १२ बजकर ७ मिनट पर।  सिनेमा हॉल में ७० प्रतिशत दर्शक। महिलाओं की संख्या ज्यादा थी। 

जब फिल्म देखने के लिए सिनेमा हॉल पंहुचे तब बहुत सारी महिलायें  नीचे ही दिखाई दे गयी , पहले तो भीड़ देख कर माज़रा समझ नही आया क्या हो गया एक साथ २५ - ३० महिलाओं की भीड़ , ऐसा लगा कि बाहर कहीं पर फ्री में टिकट बंट रही थी लेकिन फिर समझ आया कि किटी पार्टी थी तो सब एक साथ फिल्म देखने आयी थीं। करीब ४ लाइनें सब उन्हीं की थी।  पहले मुझे लगा कि आज फिल्म अच्छे से देख नही पाऊँगी क्योंकि जब भी बड़ा ग्रुप कोई साथ में बैठा होता है तो उनकी इतनी बातें होती हैं कि आप फिल्म के सम्वाद सुन नही सकते लेकिन जिसका मुझे डर था वो कुछ भी नहीं हुआ और बहुत अच्छे से फिल्म देखी और आनंद भी उठाया। 

क्योंकि गौरी शिंदे ने बहुत अच्छी फिल्म बनायी है। कहानी ,संवाद , अभिनय, गीत - संगीत, निर्देशन सभी अच्छा कहीं कुछ भी दर्शकों पर थोपा हुआ नही था नहीं तो आज जिस तरह की फ़िल्में बनती हैं समझ ही नही आता कि क्या बनाना चाह रहे थे और क्या बन गया ? जिंदगी बहुत आसान नही है , प्यार , रिश्ते , सम्बन्ध , कॅरियर सभी कुछ  व्यक्ति को मन मुताबिक मिल जाये ऐसा बहुत कम होता है और जिसके साथ ऐसा होता है वो बहुत ही खुश नसीब होता है। 

सभी की जिंदगी में कुछ न कुछ मुश्किल आती हैं ऐसे में किसी जग ( पानी वाला जग नही ) यानि डॉ जहांगीर खान ( शाहरुख़ ) जैसा सायकोलॉजिस्ट मिल जाये तो जिंदगी कितनी आसान हो जाये। जिंदगी की मुश्किल घड़ी में काश हर किसी  ऐसा मेंटर मिल जाये तो क्या कहने। 

अपनी जिंदगी से प्यार करें  , बिना डरे वो सब करें  जो करना चाहते हैं , जिंदगी बहुत प्यारी है। कायरा (आलिया भट्ट ) की तरह अपनी जिंदगी की उलझन सुलझायें और खुश रहें। 

एक अच्छी फिल्म देखना चाहते हैं तो डियर जिंदगी जरूर देखें  

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

"शिवाय" फिल्म धार्मिक नही है

अजय देवगन की फिल्म "शिवाय" जिसका सभी को बेताबी से इंतज़ार था लेकिन यह फिल्म उस तरह से प्रभावित नही कर सकी जैसे की दर्शकों को उम्मीद थी।  हालाँकि एक्शन बहुत ही अच्छे हैं फिल्म में, लेकिन फिर भी फिल्म कहीं - कहीं बहुत धीमी हो जाती है दर्शकों को उँबासी आने लगती है ।

फिल्म के शुरुआत में जिस तरह से गीत "बोलो हर हर " से अजय देवगन की एंट्री होती है वो बहुत ही अच्छा है देखने।  पौन घण्टे की  फिल्म एडिट हो जाये तो दर्शक बिना ऊबे हुए फिल्म का आनंद उठा सकते हैं। क्योंकि फिल्म की कहानी तो पुरानी ही है उस पर दृश्य बहुत लंबे हैं। हीरो - हीरोइन मिले प्यार हुआ , हीरोइन  गर्भवती हो गयी उसे बच्चा नही चाहिए उसकी मजबूरी है, हीरो को बच्चा चाहिए।  बच्चे के जन्म के बाद हीरोइन अपने देश वापस चली गयी। अकेला हीरो बेटी को पालता है। थोड़ी बड़ी होने पर बेटी को अपनी माँ के बारें में पता चलता है उसे अपनी माँ से मिलना है।  हीरो ले जाता है मिलाने फिर बेटी किडनैप हो जाती है। बस शिवाय का सिंघम जाग जाता है। यानि एक्शन ही एक्शन वैसे पिता - पुत्री के बीच के दृश्य बहुत भावुक करने वाले हैं। 

"बोलो हर हर महादेव " गीत अच्छा है , लेकिन कैलाश खेर के गाये गीत का फिल्मांकन बहुत ही बुरा है। "तेरे नाल इश्का " में सायशा सैगल को पता नही क्यों बाथ टब में दिखाया ? सायशा अच्छी लगी हैं फिल्म में।  वीर  दास ने अच्छा काम किया है।  एरिका कार और एबीगेल एमेस का काम भी अच्छा है।  

अजय देवगन की कहानी है निर्देशन भी उन्हीं का तो हर फ्रेम में वो ही है।  फिल्म का नाम शिवाय जरूर है लेकिन फिल्म धार्मिक नही है  . २८ अक्टूबर को रिलीज़ हुई फिल्म "शिवाय " ने ४ दिनों में कुल कमाई की है  ४५. ९१  लाख जबकि ९५ करोड़ में बनी है। 

"शिवाय " और "ऐ दिल है मुश्किल " दोनों फिल्मों के एक साथ रिलीज़ होने पर अजय देवगन के कहा था कि ," जो फिल्म अच्छी होगी वो ही सफल होगी। " अब देखते हैं कौन सी हिट होगी वैसे अभी तक कमाई में देखें तो करन जौहर की फिल्म आगे है।  

गुरुवार, 22 सितंबर 2016

बेमज़ा है फिल्म "डेज ऑफ तफ़री"

बेमज़ा है फिल्म "डेज ऑफ तफ़री". सबसे पहले तो फिल्म का  नाम ही ग़लत लिखा है तफ़री नही होता बल्कि "तफ़रीह" होता है जिसका मतलब होता है सैर -- सपाटा। खैर अगर  "तफ़रीह" भी रख लेते तो क्या उखाड़ लेते निर्देशक कृष्णदेव याज्ञनिक क्योंकि फिल्म युवाओं को ध्यान में रख कर बनाई है लेकिन सारी की सारी फिल्म बकवास है। युवाओं का मतलब अपने फोन में पापा का नाम बाप रखना , पापा का फोन आने पर कोसना की बाप को किसने बनाया ? उनका फोन नही उठाना और भी  क्या - क्या और सुबह होने पर उसी बाप से पैसे माँगना , पढ़ाई छोड़ कर बाकी सारी अश्लील हरकतें करना।  शराब पीना , लड़की को बहुत ही गन्दी नज़रों से देखना और हर दूसरे सीन में बस वॉशरूम में सू सू कम्पटीशन।  

निर्देशक कृष्णदेव याज्ञनिक ने यह फिल्म "छेल्लो दिवस " नाम गुजराती फिल्म की रिमेक बनाई है लेकिन यह जरूरी नही कि जो निर्देशक प्रादेशिक फिल्म अच्छी बनाये वो हिंदी फिल्म भी अच्छी बनायें।  इस फिल्म को हास्य फिल्म कह कर प्रचारित किया जा रहा है लेकिन एक भी सीन ऐसा नही है जिसमें किसी को भी दर्शक को हंसी आयी हो। जबकि परदे पर सभी कलाकार ज़ोर ज़ोर से हंस रहे थे। 

निर्माता रश्मि शर्मा एक ओर तो  "पिंक " जैसी फिल्म बना रही है वहीँ दूसरी ओर "डेज ऑफ तफ़री" फिल्म भी बना रही हैं। 
 कल रात पी वी आर आइकॉन में  "डेज ऑफ तफ़री" का शानदार प्रीमियर हुआ जिसमें मुम्बई के करीब ४०० कॉलेज के छात्र इसमें शामिल हुए।  बॉलीवुड के इतिहास में ऐसा पहली ही हुआ है जिसमें रेड कार्पेट पर इतनी बड़ी संख्या में छात्र फिल्म के कलाकारों के साथ चलें। 

यह सब तो ठीक है  लेकिन अगर निर्देशक फिल्म बनाने में थोड़ा सा ध्यान देते तो दर्शक यह फिल्म पूरी देखते ना कि बीच में छोड़ कर "तफ़रीह" निकल जाते। 

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

एक्शन पसन्द हैं तो देखें अकीरा

akira.jpgआज रिलीज़ हुई  फिल्म है "अकीरा " - संस्कृत में अकीरा का अर्थ होता है "शक्ति " . फिल्म की शक्ति, अकीरा शर्मा यानि सोनाक्षी सिन्हा ने काम अच्छा किया है एक्शन भी अच्छे किये हैं। उसके पास सारी शक्तियाँ हैं लेकिन फिर भी "अकीरा " को फिल्म में और "अकीरा" फिल्म को वो सफलता हासिल नही होती जो कि होनी चाहिये।  

२०११ में रिलीज़ हुई तमिल फिल्म " मौनारगुरु " की रिमेक फिल्म "अकीरा" में निर्देशक ए आर मुरुगदास वो कमाल नही दिखा पाये जो की उन्होंने गज़नी और हॉलिडे  में दिखाया था।  भरपूर एक्शन वाली इस फिल्म में एक्शन तो हैं लेकिन महिला प्रधान फिल्म होने के बावजूद इमोशन कुछ कम है।  कोंकणा सेन ने हमेशा की तरह अच्छा काम किया है।
  निर्माता  - निर्देशक अनुराग कश्यप फिल्मों में अभिनय करने  के लिये ही मुम्बई आये थे। इस फिल्म में वो जब - जब परदे पर आये अच्छे लगे, एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी की भूमिका अच्छे से निभायी है । हालांकि फिल्म का नाम "अकीरा" है सोनाक्षी मुख्य किरदार  में हैं लेकिन बावजूद इसके अनुराग ही पूरी फिल्म में छाये रहे एक तरह से कह सकते हैं यह फिल्म अनुराग की ही फिल्म है.

अगर  आप एक्शन फ़िल्में देखने  के शौक़ीन हैं तो आपको यह फिल्म पसन्द आयेगी।  फिल्म में गीत - संगीत, रोमांस बिलकुल भी नही है और फिल्म  इसकी जरूरत  भी नही महसूस  हुई.   

ब्लॉक बस्टर तो नही होगी यह फिल्म लेकिन हो सकता है कोई बड़ी फिल्म के न होने की वजह से शायद थोड़ी सफलता हासिल कर ले।   


वाकई में ये तो टू मच ही हो गया

 फिल्म है " ये तो टू मच हो गया " निर्माता अली उनवाला और निर्देशक अनवर खान की इस फिल्म को देखकर सच में यही लगा कि वाकई में ये तो टू मच ही हो गया है।  जिम्मी शेरगिल की दोहरी भूमिका और अरबाज़ खान की भाई की भूमिका भी फिल्म को बचा नही पायी। क्योंकि फिल्म को बनाने के बाद निर्देशक ने एक भी बार फिल्म को सही से देखा नही अगर देखते तो शायद फिल्म का यह हश्र नही होता। 

गूगल , फेसबुक और सेल्फ़ी जैसी आज की लोकप्रिय बातें दिखाने वाले निर्देशक अभी भी ७० के दशक की कहानी पर अटके हुए हैं एक भाई मन शहर जाता है जबकि दूसरा भाई मोहन गाँव में है वो सब कुछ करता है बस कोई नौकरी नही करता।  फिल्म की  हीरोईन फिर भी उससे शादी करने के लिए उतावली और हीरो की माँ कहीं भी अपनी छड़ी लेकर अपने बेटे को पीटने लगती है।  अरबाज़ खान सूट - बूट में अच्छे लगे हैं मगर  वो भाई  कहीं से भी नही लग रहे। पूजा और ब्रूना दोनों ही साधारण हैं। 

फिल्म में सभी कुछ टू मच है लेकिन फिर भी दर्शकों को बांधे रखने में सक्षम नही है।  गीत - संगीत , संवाद कुछ भी अच्छा नही है। आज जबकि जिमी की फ़िल्में सफल हो रही हैं उसका भी फायदा नही उठा सकें निर्देशक अनवर खान। 

इससे ज्यादा फिल्म के बारें में लिखना भी टू मच हो जायेगा। 


सोमवार, 22 अगस्त 2016

हैप्पी भाग जायेगी" --- हैप्पी के भागने में मज़ा है

दोपहर ११. ३० का शो , पी वी आर आइकॉन, अँधेरी वेस्ट।
हालांकि दर्शक ज्यादा नही थे थियेटर में, लेकिन जितने भी दर्शक थे सभी ने पूरी तरह से फिल्म "हैप्पी भाग जायेगी" का आनंद लिया सभी को हैप्पी के भागने में मज़ा आ रहा था।

 हल्की - फुल्की रोमांटिक कॉमेडी वाली इस फिल्म में अपनी शादी से भागी हैप्पी  गलती से अमृतसर से लाहौर जा पँहुचती है. उसके बाद क्या क्या और कैसे कैसे होता है ?  यह देखने लायक है।  भारत और पाकिस्तान के बीच के रिश्ते को भी बहुत ही अलग तरीके से दिखाया गया है।  न ही किसी तरह का कोई तनाव और न ही कोई लड़ाई झगड़ा है इस फिल्म में , ऐसा पहली ही बार हुआ है किसी भी फिल्म में , इससे पहले अभी तक जितनी भी फिल्मों में भारत और पाकिस्तान दिखाया गया है  उनमें दोनों देशों के बीच दुखद और कड़वे संबंधों को ही दिखाया गया है। 

निर्देशक मुदस्सर अजीज़ ने अच्छा निर्देशन किया है अभय देओल , डायना पेंटी , जिम्मी शेरगिल , अली फज़ल , पीयूष मिश्रा और मोमन शेख सभी ने अच्छा काम किया है।  अगर आप यह फिल्म देखना चाहते हैं तो जरूर देखिये क्योंकि साफ़ - सुथरी सी यह फिल्म आप
को जरूर पसन्द आयेगी।     

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

अच्छे हैं बी एफ जी यानि बड़े फ़रिश्ते जी

वाल्ट डिज़्नी पिक्चर्स और स्टीवन स्पिलबर्ग की यह फिल्म बड़े फ़रिश्ते जी यानि बी एफ जी ( द बिग फ्रेंडली जायंट ) हिंदी में डब फिल्म है।  वैसे तो यह अंग्रेजी भाषा की ही फिल्म है लेकिन अब लगभग सभी    फ़िल्में हिंदी भाषी दर्शकों लिए भी उपलब्ध हैं।   

निर्देशक स्टीवन स्पिलबर्ग ने यह फिल्म बच्चों के लिए बनाई है और बच्चों को पसन्द भी आयेगी। १९८२ में  रोआल्ड ढल के लिखे हुए  उपन्यास पर आधारित फिल्म यह एक अनाथ लड़की  और बी एफ जी की है जिन्हें प्यार से बच्चे बड़े फ़रिश्ते जी के नाम से बुलाते हैं. बी एफ जी  दैत्यों के राज्य में रहने वाले एक अच्छे दैत्य हैं  जो की अन्य दैत्यों की तरह इंसानों को अपना भोजन बनातें बल्कि जिससे लोग खुश हो सकें ऐसे सपने खोजते हैं और रात में शहरों  में घूम घूम कर बच्चों और बड़ों सभी की सपने दिखाते हैं। ऐसे ही एक रात १० साल की बच्ची सोफ़ी ( रूबी बार्नहिल ) से उसकी मुलाक़ात होती है. 

सोफी की हिंदी डबिंग परिणीति चोपड़ा ने की है जबकि बी एफ जी यानि मार्क रीलांस की डबिंग हमारे बिग बी ने की है।  हिंदी के साथ बीच - बीच में भोजपुरी भाषा सुनकर मज़ा आ रहा था  बिग बी की आवाज़ में. बच्चों  को मज़ा आयेगा जब थ्री डी में वो २४ फुट के बी एफ जी को देखकर जब वो हिंदी बोलेगें।      



सोमवार, 25 जुलाई 2016

"मदारी -- शि....... देश सो रहा है " -- सच में देश सो ही रहा है

पी वी आर सिटी मॉल , अँधेरी वेस्ट ,मुम्बई। 
 फिल्म "मदारी " दोपहर १२ बजे का शो, मुश्किल से १५ - २० दर्शक , वो भी इरफ़ान खान की फिल्म में।  बहुत अफ़सोस की बात है. अभी कोई अश्लील संवादों वाली हास्य फिल्म होती तो शायद दर्शक भरे होते थियेटर में। ये सब देख कर लगता है कि सच में देश सो ही रहा है. 

"मदारी -- शि.......  देश सो रहा है " यह टैग लाइन है फिल्म "मदारी" की।  सच में देश सो रहा है कितने लोग ऐसे ही मर जाते हैं , पुल गिर जाता है , राह में चलते आम आदमी का अपहरण हो जाता है, हत्या हो जाती है, ट्रेन ब्लास्ट हो जाता है, लोग मर जाते हैं ,ऐसे हादसे में जिस घर का व्यक्ति मरता है बस उसी पर दुखों का पहाड़ टूट जाता है।  बाकि तो सारा देश वैसे ही चलता रहता है जैसे पहले चलता था। कोई खबर लेने वाला नही सबकी दुकान पहले की तरह चलती रहती है।  

आम इंसान जिसके वोट के सहारे देश के राजनिति चलती है , सत्ता में बैठ कर मंत्री अपना घर भरते रहते हैं ऐसे में वो आम इंसान क्या करे जिसका बच्चा , पति , पत्नी किसी हादसे का शिकार हो जाये और सरकार मरने वाले की कीमत या मुआवज़ा देकर उसके परिवार वालों को चुप बैठने पर मजूबर कर देती है।  फिर सोते हुए देश को जगाने के लिए आम इंसान वो ही करता है जो कि फिल्म में निर्मल कुमार  (इरफ़ान खान ) ने किया।  जिस दर्द से वो गुज़रता है वही दर्द वो देश के गृह मंत्री को देता है। 
 इरफ़ान कैसे कलाकार हैं यह किसी को भी बताने की जरूरत नही है , निर्देशक निशिकान्त कामत ने शैलजा केजरीवाल की कहानी को अच्छा बनाने की कोशिश की है लेकिन जो रफ़्तार उन्होंने फिल्म के दूसरे हॉफ में पकड़ी है वही तेजी वो फिल्म के पहले हिस्से में दिखाते तो फिल्म और अच्छी बन सकती थी।  पहला भाग बहुत ही धीमा है दर्शक को बोरियत होने लगती है। 

अगर आप इरफ़ान खान के प्रशंसक हैं तब तो आपको फिल्म देखनी ही चाहिए क्योंकि इस फिल्म में उन्होंने अभिनय तो किया ही है साथ ही सी फिल्म से ही उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में  कदम रखा है।  


शुक्रवार, 10 जून 2016

अच्छी कहानी , अच्छा निर्देशन , अच्छा अभिनय का समन्वय है TE3N फिल्म

आज अमिताभ बच्चन , विद्या बालन और नवाजुद्दीन सिद्दीकी की TE3N फिल्म रिलीज़ हुई।  निर्देशक रिभु दासगुप्ता की इस फिल्म में ३ एक से बढ़कर कलाकार हैं जिन्होंने अपने अभिनय से फिल्म में चार चाँद लगा दिये।  अमिताभ बच्चन ने एक बुजुर्ग के किरदार को जीवंत किया है वहीं विद्या और नवाज़ भी कहीं भी कम नहीं लगे हैं।  अगर आप इन तीनों ही कलाकारों के अभिनय के कायल हैं तो आपको यह फिल्म देखनी चाहिए।  हाँ 
इस फिल्म में फ़ालतू का नाच गाना नहीं है अगर यह सब देखना चाहते हैं तो यह फिल्म आपके लिये नहीं हैं.

कोलकाता की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म आपको एक टक परदे पर देखने को मजबूर करेगी और आखिरी तक आपकी उत्सुकता बरक़रार रहेगी फिल्म की कहानी जानने की। TE3N फिल्म एक अच्छी कहानी , अच्छा निर्देशन , अच्छा अभिनय और अच्छे गीत - संगीत का समन्वय है. गीत - संगीत भी दिल को छू लेने वाला है बिग बी की आवाज़ में भी एक गीत है "क्यों रे ". अच्छा है सुनने में।

रविवार, 15 मई 2016

अज़हरुद्दीन के पॉइंट ऑफ़ व्यू से बनाई गयी अज़हर

पी वी आर सिटी मॉल अँधेरी वेस्ट फिल्म "अज़हर " दोपहर ११- ५० का शो टाइम , थिएटर लगभग भरा। 

लेकिन जो दर्शक इस फिल्म में देखना चाहते थे वो नहीं था इस फिल्म "अज़हर" में। जबकि हर कोई जानता है कि यह फिल्म  क्रिकेट खिलाडी मोहम्मद अज़हरुद्दीन के जीवन पर बनी है और फिल्म के लगभग हर प्रोमोशन पर भी वो फिल्म के कलाकारों  इमरान हाशमी , प्राची देसाई और लारा दत्ता के साथ दिखाई दिये बावजूद  इसके, फिल्म के निर्माता - निर्देशक फिल्म के शुरू में ही यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि यह फिल्म  मोहम्मद अज़हरुद्दीन की जीवनी नहीं बल्कि दर्शकों के मनोरंजन के लिये बनाई गयी है इस फिल्म में फिल्माये गये दृश्य भी सभी सच नहीं है. जिससे इस फिल्म को देख कर कोई भी खिलाडी जिन्हे इस फिल्म में दिखाया गया है वो फिल्म के निर्माता को कचहरी के दर्शन न करा दे। 

फिल्म बहुत धीमी है , ठीक है फिल्म अज़हरुद्दीन को लेकर बनाई है लेकिन कुछ तो दूसरे खिलाडियों का पक्ष भी दिखाना चाहिये था. फिल्म में बार - बार अज़हर कहते हैं कि मैं अपनी दोनों पत्नियों को कोर्ट में नहीं लेकर आऊँगा लेकिन फिल्म के निर्देशक उनकी पत्नी के साथ कई बार लम्बे - लम्बे किसिंग सीन दिखाते हैं।  दोहरा मानसिकता क्यों दिखाई निर्देशक टोनी डिसूजा ने,?  क्या वो इमरान हाशमी की सीरियल किसर की जो छवि है उसे भुनाना रहे थे या अज़हर पर फिल्म बना रहे थे ? शायद वो ही भूल गये थे। 

संगीता कभी भी बहुत बड़ी अभिनेत्री नहीं रही थी और उनकी एक भी फिल्म सुपर हिट नहीं रही हाँ सलमान खान के साथ अपने रिश्तों को लेकर ही बस वो चर्चा में थी जबकि इस फिल्म में उन्हें बड़ी हीरोइन कहा गया। 

यह तो शुरू से ही सब कह रहे थे कि इमरान हाशमी फिल्म में कहीं भी अज़हर जैसे नहीं लग रहे हैं और यह सच ही साबित भी हुई. हाँ यह बात अलग है कि इमरान ने अपना काम ठीक ठाक किया है। फिर भी दर्शक सिर्फ अज़हरुद्दीन के लिए ही फिल्म देखने जा रहे हैं और उन्हें निराशा ही हाथ लग रही है। अज़हरुद्दीन के पॉइंट ऑफ़ व्यू से बनाई गयी इस फिल्म में उन्हें बिलकुल मासूम और दूसरों को छिछोरा दिखाया है जैसे रवि शास्त्री को दिखाया है।  

इस फिल्म की एक ख़ास बात यह है कि अभिनेता कुणाल रॉय कपूर की यह फिल्म बेहतरीन फिल्म कही जा सकती है क्योंकि उन्होंने वकील की अच्छी भूमिका अभिनीत की है।  लारा , प्राची और नरगिस ने भी ठीक काम किया है 

#अज़हरुद्दीन #इमरानहाशमी #कुणालरॉयकपूर

शनिवार, 7 मई 2016

सच्ची घटना पर भावुक फिल्म ट्रैफिक


चेन्नई की सच्ची घटना से प्रेरित है फिल्म ट्रैफिक।  निर्देशक राजेश पिल्लई ने पहले २०११ में मलयालम में इस फिल्म को बनाया।  वहां बहुत सराहा दर्शकों ने इस फिल्म को ,फिर उन्होंने इसी फिल्म को इसी नाम से हिंदी में बनाने के बारें में सोचा। लेकिन राजेश हिंदी में बनी फिल्म "ट्रैफिक" की रिलीज़ देख पाते उससे पहले ही  फरवरी २०१६ में उनका  स्वर्गवास हो गया।  

बहुत ही कसी और भावुक कर देने वाली फिल्म है कि कैसे एक १२ साली की बच्ची का हार्ट ट्रांसप्लांट होता है ?कैसे मुंबई के ट्रैफिक में से ट्रैफिक कॉन्स्टेबल पुलिस की गाड़ी से सिर्फ ढाई घंटे में हार्ट पूना में पंहुचा देता है जबकि मुंबई में बहुत तेज बारिश है फिर भी  १२० किमी की रफ़्तार से गाड़ी चला कर कॉन्स्टेबल यह सब कर दिखाता है उस समय जबकि पुलिस के बड़े अफसर भी मना कर देते हैं क्योंकि ट्रैफिक की वजह से ऐसा सम्भव नहीं है ? 
कैसे पुलिस विभाग और ट्रैफिक विभाग जी जान लगा देता है उस बच्ची की जान बचाने के लिये ?
सभी कलाकारों ने उम्दा अभिनय किया है चाहे वो मनोज बाजपेयी हो , जिमी शेरगिल , दिव्या दत्ता , सचिन खेड़ेकर हो या किट्टू गिडवानी।  इस फिल्म में बंगाली अभिनेता प्रसन्नजीत चटर्जी और परमब्रता चटर्जी भी हैं।   

इस फिल्म को देखकर कुछ लोग सच में प्रेरित हो तो ऐसे कई लोगों की जान बचायी जा सकती है। 



शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

मार्शल आर्ट को पसंद करते हैं तो देखें फिल्म "बागी : ए रिबेल फॉर लव"

फिल्म का नाम है बागी  : ए  रिबेल  फॉर लव , २ घंटे ३० मिनट की इस फिल्म में प्यार के लिये विद्रोह नहीं बल्कि केरल की मार्शल आर्ट कलारीपयट्टु का प्रदर्शन ही है यानि जो कुछ रॉनी (टाइगर श्रॉफ) ने इस फिल्म में अपने गुरु ( ग्रांड मास्टर शिफूजी शौर्या भारद्वाज , जो की असली जिंदगी में कमांडो ट्रेनर हैं ) से सीखा उसे फिल्म के खलनायक राघव ( सुधीर बाबू , भूतपूर्व बैडमिंटन खिलाड़ी और तेलुगु फिल्मों के कलाकार और तेलुगु अभिनेता महेश बाबू के रिश्तेदार हैं , सुधीर बाबू की यह पहली हिंदी फिल्म है ) के खिलाफ प्रयोग में लिया। जैसे फिल्म "कराटे किड " में जाडेन स्मिथ करता है अपने गुरु जैकी चैन से ट्रेनिंग लेने के बाद।
केरल से मार्शल आर्ट सीख कर हीरो बैंकॉक में विलेन और उसकी आर्मी को पीट कर आता है। केरल की हरियाली और बोट रेस भी दिखायी है निर्देशक सब्बीर खान ने जिन्होंने द रेड : रिडेम्पशन और तेलुगु फिल्म वर्षम को मिला कर बागी बना दी। 

बारिश और हीरो - हीरोइन का गज़ब का कनेक्शन दिखाया है जब भी बारिश होती है श्रद्धा कपूर नाचने - गाने और भीगने लगती है चाहे रेलवे स्टेशन हो या बाज़ार।  

अगर आप मार्शल आर्ट को पसंद करते हैं तो जाये आप यह फिल्म "बागी  : ए  रिबेल  फॉर लव" देखने। क्योंकि इसमें प्यार , रोमांस नहीं बल्कि केरल की मार्शल आर्ट कलारीपयट्टु ही है। टाइगर ने इस आर्ट को परदे में दिखाने में बहुत मेहनत की है। फिल्म का पहला हिस्सा अच्छा कह सकते हैं। हाँ एक ख़ास बात कि हमारी सीधी सादी सी श्रद्धा कपूर ने भी मार्शल आर्ट करती दिखाई दी है , अच्छा लग रहा था इस तरह उन्हें एक्शन करते हुए। 

इस फिल्म में भी श्रद्धा ने 
अरमान मलिक के साथ गीत गाया है "सब तेरा " अच्छा है यह गीत। बाकी गीतों की धुनें पुरानी है। 


शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

संता बंता प्राइवेट लिमिटेड -- संता बंता के नाम को भी कैश नहीं कर पाये

"संता बंता प्राइवेट लिमिटेड' कहने को तो इस फिल्म का प्रचार एक हास्य फिल्म के रूप में किया गया था। लेकिन 1 घंटा 52 मिनट की इस फिल्म में मुश्किल से कुछ एक जगह ही हंसी आती है। 

 निर्देशक आकाशदीप साबिर की इस फिल्म में हास्य अभिनय में माहिर कई दिग्गज हैं जैसे बमन ईरानी, वीर दास, नेहा धूपिया, लीजा हेडन, राम कपूर, विजय राज, संजय मिश्रा, जॉनी लीवर।  इसके बावजूद हास्य के नाम पर जीरो है यह फिल्म । निर्देशक "संता बंता " के नाम को भी कैश नहीं कर पाये। 

सारे के सारे जोक्स पुराने और घिसे पिटे हैं , जॉनी लीवर भी हंसा पाने में कामयाब नहीं हुए। फिल्म के आखिरी दृश्य में पूर्व प्रधानमंत्री को दिखा कर हंसाने की असफल कोशिश की निर्देशक ने। हाँ इतना जरूर है की अश्लील हास्य नहीं है फिल्म में।  

गीत - संगीत में बिलकुल दम नहीं है। क्या सोच कर बनायी यह फिल्म।  कम से कम फ़िजी की ख़ूबसूरती ही दिखा देते।