रविवार, 18 जुलाई 2021

हौसलें और संघर्ष की कहानी तूफ़ान

हिंदी फिल्म --तूफान 
ओ टी टी --अमेज़न प्राइम विडियो 
निर्माता -- रितेश सिधवानी, फ़रहान अख़्तर और  राकेश ओमप्रकाश मेहरा
निर्देशक -- राकेश ओमप्रकाश मेहरा
लेखक -- अंजुम रजबअली , विजय  मौर्या , फ़रहान अख़्तर 
कलाकार -- फ़रहान अख़्तर , परेश रावल , मृणाल ठाकुर 
संगीत -- शंकर - अहसान --लॉय , सैमुएल-आकांक्षा , डेनियल लोज़िंस्की  

कहानी -- 
एक वसूली करने वाले गुंडे के राष्ट्रीय स्तर के बॉक्सर बनने की कहानी है फिल्म "तूफ़ान " की। अज्जू उर्फ अजीज अली (फ़रहान अख़्तर ) डोंगरी का गुंडा है। वह  जफर भाई ( विजय राज ) के लिए वसूली का काम करता है। अनाथालय में पला अजीज गुंडा है लेकिन दिल का बहुत अच्छा है। एक दिन मार पिटाई के समय उसके सिर में चोट लग जाती है और वह अस्पताल जाता है जहां उसकी मुलाकात डॉक्टर अनन्या (मृणाल ठाकुर ) से होती है। अनन्या के समझाने पर अजीज कोच नाना प्रभु (परेश रावल ) की कोचिंग में बॉक्सर बनने की ट्रेनिंग लेता है और एक दिन राष्ट्रीय स्तर का बॉक्सर बन जाता है। लेकिन तभी कुछ  ऐसा होता है जिससे अजीज पर ५ साल का बैन लग जाता है। अजीज और अनन्या दोनों शादी कर लेते हैं। ऐसा क्या होता है जिससे अजीज ५ साल तक खेल नहीं सकता ? क्या अजीज और अनन्या की शादी सफल हो पाती है ? क्या दोबारा अजीज रिंग में उतर पाता है ? यह सब जानने के लिए तो आपको फिल्म तूफान देखनी पड़ेगी। 
क्यों देखें तूफ़ान 

इस फिल्म से पहले भी ओम प्रकाश मेहरा और फरहान अख्तर फिल्म " भाग मिल्खा भाग " में साथ काम कर चुके हैं। आप सभी जानते हैं कि उस फिल्म ने कितनी सफलता हासिल की थी। यह फिल्म उतनी सफल तो नहीं होगीं लेकिन दर्शक निराश भी नहीं होंगे फिल्म "तूफ़ान " से। क्योंकि तूफ़ान शुरू से आखिरी तक  दर्शकों को बांधे रखने में सक्षम है।   
 निर्माता रितेश सिधवानी, फरहान और राकेश ओमप्रकाश मेहरा की इस स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म को फ़रहान अख़्तर ने अंजुम रजबअली और विजय  मौर्या के साथ मिलकर लिखा है।  तूफ़ान के संवाद और गीत - संगीत दोनों ही अच्छे हैं। रैप सिंगर डेविल का रैप लोगों में  लोकप्रिय होगा। फ़रहान ने तूफ़ान के लिए जो मेहनत की है  वो पर्दे पर दिखाई देती है। अच्छा काम है उनका। इसी तरह मृणाल ने भी अच्छा काम किया है। परेश रावल , मोहन अगाशे ,सुप्रिया पाठक अच्छे  कलाकार हैं। नायक के दोस्त की भूमिका में हुसैन दलाल जमें हैं। यानि जब सभी का काम अच्छा है , गीत - संगीत , संवाद अच्छे हैं तो एक बार तो इस फिल्म को दर्शकों को देखना ही चाहिये। हौसलें और संघर्ष की कहानी तूफ़ान को देखकर दर्शक निराश नहीं होंगे। 

बुधवार, 7 जुलाई 2021

सस्ते उपन्यास की हसीन दिलरुबा

हिंदी फिल्म --  हसीन दिलरुबा
ओ टी टी -- नेटफ्लिक्स
बैनर -- कलर येलो  प्रोडक्शंस , टी सीरीज , इरोज एंटरनेशनल  
निर्माता -- आनंद एल राय , हिमांशु शर्मा , भूषण कुमार , कृष्ण कुमार 
निर्देशक: विनिल मैथ्यू
लेखिका-- कनिका ढिल्लों 
कलाकार: तापसी पन्नू, विक्रांत मैसी, हर्षवर्धन राणे, आदित्य श्रीवास्तव, दया शंकर पांडे, यामिनी दास आदि
संगीत - अमित त्रिवेदी 

कहानी -- 
२ घंटे १५  मिनट की अवधि वाली इस फिल्म " हसीन दिलरुबा " की कहानी घूमती है  रानी  के चारों ओर। रानी जो कि बहुत ही खूबसूरत, हसीन और जवान लड़की है। उसे क्राइम और थ्र‍िलर उपन्‍यास पढ़ना बहुत पसंद है।  उस पर अपने ही पति रिशु  के कत्‍ल का इल्‍जाम है। लेकिन जैसे-जैसे पुलिस की जांच आगे बढ़ती है और  उसकी शादीशुदा जिंदगी के कई राज खुलते जाते हैं जिससे मामला और भी उलझता जाता है। शुरू में  जहाँ पुलिस को रानी का यह केस बहुत ही साधारण लग रहा था वहीं अब उसकी जिंदगी की पेचीदगियों से यह और भी उलझता जाता है। क्या रानी ही जिम्मेदार है अपने पति की हत्या की ? 

समीक्षा ---
दिल्ली की रहने वाली रानी कश्यप (तापसी पन्नू ) एक आधुनिक लड़की है। उसे लेखक दिनेश पंडित के एक्शन और थ्र‍िलर उपन्यास पढ़ना बहुत पसंद है। उपन्यासों की तरह ही उसे अपनी जिंदगी में भी भरपूर रोमांस और रोमांच चाहिये।  जबकि उसकी शादी एक सीधे सादे से ऋषभ सक्सेना ( विक्रांत मैसी ) से हो जाती है, जो  कि ज्वालापुर के बिजली विभाग में इंजीनियर है जिसकी जिंदगी बहुत ही साधारण है लेकिन रानी को अपने पति से कुछ ज्यादा ही  उम्मीदें हैं। उनकी शादी हुए कुछ अरसा ही हुआ है तभी उनके घर में ऋषभ का कजिन नील (हर्षवर्धन राणे) आता है। नील देखने में आकर्षक  है। बस रानी नील की तरफ आकर्षित हो जाती है और दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाते हैं या यूँ कहें तो रानी को नील से प्यार हो जाता है जबकि नील तो बस अपनी इच्छाओं को पूरा कर रहा था। रानी जिसे चाय भी बनानी नहीं आती ऐसे में प्यार में अंधी वो नील के लिए नॉन वेज खाना भी यू ट्यूब देख कर बनाती है। रानी नील के साथ अपनी जिंदगी के सपने देखने लगती है। जबकि नील मौका देखकर चुपचाप रानी को बिना  बताये ज्वालापुर से चला जाता है, या यूँ कहें भाग जाता है।
रानी रिशु को अपने और नील के बारें में सब सच बता देती है। रिशु को नील और रानी के रिश्ते का सच जब पता चलता है तब वो बहुत परेशान हो जाता है। पहले ही रानी और रिशु के संबधं कुछ अच्छे नहीं थे और जब यह कड़वा सच उसके सामने आता है तो क्या होता है यह जानने के तो लिए आपको यह फिल्म देखनी होगी।  

फ़िल्म क्यों देखें ? 
 विज्ञापन फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक विनि‍ल मैथ्यू  की यह फिल्म दूसरी है।  इनकी पहली फिल्म " हँसी तो फँसी "( २०१४ ) में आयी थी। लोकप्रिय लेखक रोल्ड डाहल की लघु कहानी 'लैम्ब टू द स्लॉटर' से प्रेरित  इस फिल्म की कहानी को लिखा है  मनमर्जियाँ  फेम कनिका ढिल्लन ने और इस फिल्म में भी उन्होंने काफी कुछ पिछली फिल्म "मनमर्जियाँ " से ही ले लिया है। इसलिये फिल्म में कुछ भी नया नहीं है।  फिल्म को देखते समय हर बार यही लगा कि अरे यह तो पहले भी देखा है। शायद कनिका को ऐसा नहीं लगा होगा।
फिल्म की शुरुआत अच्छी है लेकिन फिर वही दोहराव दर्शकों को ज्यादा देर तक बांधे नहीं रखता। जहाँ तक कलाकारों की बात करें तो व्यक्तिगत रूप से सभी का काम अच्छा है। तापसी ने मजबूत , जिद्दी ,  कामुक रानी का किरदार बखूबी निभाया है। सीधे - सादे पति भूमिका में 
विक्रांत मैसी  ने हमेशा की तरह अच्छा अभिनय किया है। विक्रांत को भी सोच समझ कर फिल्में करनी चाहिए। 
हर्षवर्धन राणे को जितना काम मिला उतना उन्होंने अच्छे से निभाया। सी आई डी फेम आदित्य श्रीवास्तव ने पुलिस अफसर का  अच्छा काम किया है।  रिशु  की माँ की बनी यामिनी दास का काम भी अच्छा है लेकिन फिर भी फिल्म में बहुत सारी कमियाँ हैं जिससे यह फ़िल्म बहुत ही बकवास हो गई है। तापसी ने क्या सोच कर यह फिल्म की होगी।समझ नहीं आया। क्योंकि यह हसीन दिलरुबा किसी सस्ते उपन्यास की हसीन दिलरुबा सी लगती है। ऐसी दिलरुबा को अच्छे दर्शक तो बिल्कुल भी नहीं मिलेंगे।

बुधवार, 30 जून 2021

दंगों का ग्रहण 

 वेब सीरीज -- ग्रहण 

ओ टी टी --डिज़्नी हॉट स्टार 

निर्देशन -- राजन चंदेल 

लेखक सत्य व्यास के उपन्यास "चौरासी " पर आधारित 

 लेखक --अनु सिंह चौधरी, नवजोत गुलाटी, विभा सिंह, प्रतीक पयोधी, रंजन चंदेल व शैलेंद्र कुमार झा

कलाकार -- जोया हुसैन , पवन मल्होत्रा , अंशुमान पुष्कर , वमिका गब्बी , टीकम जोशी, सहीदुर रहमान  आदि।

डिज्नी हॉट स्टार पर प्रसारित वेब सीरीज "ग्रहण " लेखक सत्य व्यास की किताब "चौरासी " पर आधारित है। २०१८ में आयी किताब "चौरासी" १९८४ में हुए दंगों पर आधारित है। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को उनके ही एक सिख अंगरक्षक ने गोली मार कर हत्या कर दी थी उसके बाद देश में जो दंगे हुए उसी को के इर्द गिर्द कहानी है इस शो "ग्रहण " की। 

 कहानी  ---  दो अलग शहर और दो अलग समय की कहानी है। दोनो  कहानी एक साथ चलती  हैं।  एक कहानी २०१६ राँची में है तो दूसरी १९८४ में बोकारो में दिखायी है।  झारखंड में चुनाव होने वाले हैं तो ऐसे में मुख्यमंत्री अपने वोटों के लिए १९९४ में हुए दंगों की पुन : जाँच कराने के लिए एक कमेटी बैठाते हैं जिसका  जिम्मा एस पी अमृता सिंह को सौपां जाता है। जाँच के दौरान इन दंगों में अमृता को अपने पिता के शामिल होने के बारें में पता चलता है  जो किसी समय ऋषि रंजन थे जबकि अब वो गुरसेवक नाम के सिख बने हुए हैं। क्या है इस सब के पीछे का रहस्य ?इसकी गुत्थी भी सुलझाने में लगी है अमृता। जबकि इसी बीच उसके पिता १९८४ के दंगों का गुनाहगार खुद को मान कर समर्पण कर देते हैं। अमृता पूरी तरह से अपनी ड्यूटी में लगी हुई है। अपने पिता से नाराज भी है कि क्यों उसे इस सच्चाई का पता नहीं है। क्या होता है ? कैसे होता है ? कौन है असली गुनाहगार ? यही सब दिखाया है इसमें। 


८ एपिसोड वाली यह सीरीज दर्शकों को  निस्संदेह रूप से पसंद आयेगी क्योंकि इसमें वो सब है जो कि दर्शक देखना चाहते हैं यानि इसमें ऋषि और मनु के बीच बहुत ही खूबसूरत प्रेम कहानी है ,पुरानी फिल्मो की बाते हैं, दंगे हैं  और राजनीति है। एक साथ बिना रुके दर्शक इस सीरीज को देख सकते हैं लेकिन बीच - बीच में राजनीति देखकर मन बहुत खराब होता है। जो लोग एक साथ बैठ कर हँसते बोलते हैं वो कैसे किसी के बरगलाने से  दूसरे को जान से मारने पर आमादा हो जाते हैं और फिर जब कुछ समझ में आता है तब पछताने के अलावा इंसान कुछ नहीं कर सकता।  एक - दो एपिसोड कुछ धीमें हैं  लेकिन फिर भी दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब है "ग्रहण "

निर्देशन -- राजन चंदेल ने अच्छा निर्देशक किया है। राजन ने एक लेखक और सहायक के रूप अनुराग कश्यप के साथ काम किया है तो उन्हें दर्शकों को कैसे बांधे रखना है यह कला आती है। शो में ऋषि की किरदार अभिनीत किया है "जामताड़ा " फेम अंशुमान पुष्कर ने अच्छा काम किया है। मनु की भूमिका में हैं वमिका गब्बी, अच्छी लगी हैं , उन्होंने इससे पहले दिल दिया गल्लां , सिक्सटीन और लव आज कल में अभिनय किया है। अमृता की भूमिका अभिनीत की है मुक्काबाज  फेम जोया हुसैन ने , अच्छा अभिनय है।  टी वी अभिनेता नंदिश सिंह संधू भी हैं इसमें ,लेकिन उनके हिस्से बहुत ही कम काम आया है। अभिनेता पवन मल्होत्रा ने  बुजुर्ग ऋषि यानि अमृता के पिता की भूमिका अभिनीत की है। हमेशा की तरह उन्होंने बहुत ही उम्दा किया है उन्हें देखना हमेशा ही अच्छा लगता है। इस सीरीज में गीत भी है जो मधुर हैं। सब कुछ अच्छा है , लेकिन इसका नाम ग्रहण क्यों रखा समझ नहीं आया। 




 

रविवार, 27 जून 2021

भरपूर एक्शन और रोमांच दर्शकों को देखने को मिलेगा फैमिली मैन 2 में

वेब सीरीज -- द फैमिली मैन -२ 

ओ टी टी -- अमेजन प्राइम वीडियो 

निर्देशक -- राज निदिमोरू और कृष्णा डी के ( राज एंड डीके ) 

लेखक -- राज निदिमोरू , कृष्णा डी के और सुमन कुमार 

कलाकार  - मनोज बाजपेयी , समंथा अक्किनेनी , शारिब हाशमी , प्रियामणि , रविंद्र विजय ( मुथु ) सीमा बिस्वास , दलीप ताहिल ,  विपिन शर्मा , श्रीकृष्ण दयाल , शरद केलकर, राजेश बालाचंद्रन, अश्लेषा ठाकुर , दर्शन कुमार। 


वेब सीरीज "द फैमिली मैन "  को दर्शको  ने इतना ज्यादा पसंद किया कि ४ जून २०२१  को इसका दूसरा सीजन भी प्राइम वीडियो पर आ गया जबकि पहला सीजन २० सितंबर २०१९ में आया था। जहाँ पहले सीजन में १० एपिसोड थे वहीं दूसरे सीजन में ९ एपिसोड हैं। पिछली बार की तरह ही  इस बार भी भरपूर एक्शन और रोमांच दर्शकों को देखने को मिलेगा साथ ही एक नई कहानी है जिसके तार पिछले सीजन के आतंकवादी मिशन से जुड़े हुए हैं। 


 गैस काण्ड को अपनी असफलता मानने वाला श्रीकांत तिवारी अब टॉस्क छोड़कर एक आई टी कंपनी में नौकरी कर रहा है। जिससे वो अपने परिवार के साथ कुछ समय बिता सके। वो काम जरुर आई टी कम्पनी में करता है लेकिन उसका दिल - दिमाग अभी भी अपने देश को समर्पित है बीच बीच में वो तलपड़े से टास्क की जानकारी भी लेता रहता है। तभी उसकी जिंदगी में कुछ ऐसा घटता है जिससे वो फिर मिशन से जुड़ जाता है।  एक ओर श्रीकांत को अपनी बेटी को  बचाना होता है तो वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री पर होने वाले अटैक की साजिश को नाकाम करना होता है। ऐसे में क्या श्रीकांत अपने मिशन के साथ-साथ अपनी बेटी को सुरक्षित घर वापस ला पाता है। यही सब दिखाया है इस सीरीज में।


कहानी --"द फैमिली मैन " के निर्देशक राज और डीके ने इस बार भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। पिछली बार श्रीकांत तिवारी की लड़ाई  आतंकवाद‍ियों से थी। वहीं इस बार उनकी लड़ाई तमिल श्रीलंकन बागी सरकार से है। ये बागी खुद को क्रांतिकारी मानते है और अपने लोगों को सत्ता में लाने और मरे अपने करीबियों का  बदला लेने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हैं। इन बागियों में एक महिला बागी है राजी (समंथा अक्किनेनी) , बचे हुए तमिल बागियों में राजी एक अकेली ऐसी पायलट है जो प्लेन उड़ाना जानती है और जो जरूरत पड़ने पर लोगों के हाथ पैर भी तोड़ - मोड़ सकती है ,उन्हें मौत के घाट उतार सकती है । इस मिशन की पूरी जिम्मेदारी उसी के कंधो पर है।  प्रधानमंत्री बसु (सीमा बिस्वास) और श्रीलंका के राष्ट्रपति दोनों देश के बीच एक अहम  समझौत होना है। इसके लिए श्रीलंका की सरकार बागियों के एक खास व्यक्ति की मांग करती है। प्रधानमंत्री बसु उस बागी  सदस्य को ढूंढ़ने का काम एजेंसी को सौंप देती है। एजेंसी उस सदस्य को ढूंढ तो लेती है पर उसे श्रीलंका को सौंपने से पहले ही एक बम धमाके में उसकी मौत हो जाती है।इस बागी की  मौत के बाद उसका भाई जो कि बागी गुट का लीडर है बुरी तरह तिलमिला जाता है और  आतंकवादी समीर (दर्शन कुमार) से हाथ मिला लेता है।अब इन दोनों का मकसद अब प्रधानमंत्री बसु और श्रीलंका के राष्ट्रपति की मुलाकात को मौत में बदलने का है। 


वहीं दूसरी ओर श्रीकांत तिवारी अब एक आईटी फर्म में काम करने लगा है।  लेक‍िन उसके मन में अब भी एजेंसी में चल रहे म‍िशन को जानने की उत्सुकता लगी रहती है। तभी कुछ ऐसा घटता है कि तिवारी फिर से मिशन से जुड़ जाता है। 


अभिनय कैसा है ? 

मनोज बाजपेयी के बारें में क्या कह सकते हैं हमेशा की तरह ,उन्होंने शानदार काम किया है हाँ गालियाँ बहुत दी है इसमें उन्होंने। दर्शक इस सीरीज को उनके ही कारण देखते हैं। समंथा अक्किनेनी ने तमिल बागी के रूप में बहुत शानदार काम किया है। एक्शन बहुत ही उम्दा किये हैं उन्होंने। उन्हें शायद इस सीरीज में इसलिए लिया है जिससे इस शो को  तमिल और तेलुगु दर्शक भी मिले और दूसरी क्या वजह हो सकती है उन्हें इस सीरीज में लेने की ,समझ नहीं आया क्योंकि हिंदी फिल्मों के दर्शक तो शायद ही उन्हें अच्छे से पहचानते हैं।  उस पर भी उन्हें काले रंग का दिखाया है तो और भी मुश्किल हैं उन्हें पहचानना। जे के तलपड़े के रूप में शारिब हाशमी ने उम्दा काम किया है।  शारिब ने वेब  शो 'असुर' में भी अच्छा काम किया था। मुथु बने रविन्द्र विजय ने भी दर्शकों को अपने अभिनय से प्रभावित किया है।शरद केलकर ने क्यों इस सीरीज में काम किया पता नहीं। ९ एपिसोड में मुश्किल से वो २ - ३ बार ही दिखे हैं। पिछली बार ही कुछ ऐसा ही था। शरद से ज्यादा से तो इसमें श्रीकांत तिवारी की बेटी बनी धृति तिवारी ( अश्लेषा ठाकुर )  का काम है। अश्लेषा ने काम भी अच्छा किया है  प्रियमणि, सीमा बिस्वास, दलीप ताहिल, दर्शन कुमार  ,सनी हिंदुजा सभी ने अपना अपना काम बखूबी किया है।

निर्देशन--

राज एंड डीके ने  "फॅमिली मैन - २ " को भी बहुत ही अच्छे तरीके से निर्देशित किया है। हाँ इस बार कुछ एपिसोड को निर्देशित करने का मौका संवाद लेखक सुपर्ण एस वर्मा को भी मिला है।  जब यह शो प्रसारित हुआ था तब शो के शुरू में तमिल भाषा को समझने में थोड़ी परेशानी जरूर हुई  थी लेकिन बाद में दर्शकों की परेशानी को देखते हुए हिंदी में भी सब टाइटल आ गये हैं जिससे अब दर्शकों को यह समस्या दूर हो गई है। कहीं कोई बोरियत नहीं होती इस सीरीज को देखने में। अगर आपने पिछला सीजन नहीं देखा तो उससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इस बार नया मिशन दिखाया गया है।  लेकिन आप को पहला सीजन भी देखना चाहिए। शरू से आखिरी तक बिना किसी रूकावट के आप दोनों ही सीजन देखना पसंद करेंगे।

वेब सीरीज -- द फैमिली मैन -२ 

ओ टी टी -- अमेजन प्राइम वीडियो 

निर्देशक -- राज निदिमोरू और कृष्णा डी के ( राज एंड डीके ) 

लेखक -- राज निदिमोरू , कृष्णा डी के और सुमन कुमार 

कलाकार  - मनोज बाजपेयी , समंथा अक्किनेनी , शारिब हाशमी , प्रियामणि , रविंद्र विजय ,सीमा बिस्वास , दलीप ताहिल ,  विपिन शर्मा , श्रीकृष्ण दयाल , शरद केलकर, राजेश बालाचंद्रन, अश्लेषा ठाकुर , दर्शन कुमार। 


वेब सीरीज "द फैमिली मैन "  को दर्शको  ने इतना ज्यादा पसंद किया कि ४ जून २०२१  को इसका दूसरा सीजन भी प्राइम वीडियो पर आ गया जबकि पहला सीजन २० सितंबर २०१९ में आया था। जहाँ पहले सीजन में १० एपिसोड थे वहीं दूसरे सीजन में ९ एपिसोड हैं। पिछली बार की तरह ही  इस बार भी भरपूर एक्शन और रोमांच दर्शकों को देखने को मिलेगा साथ ही एक नई कहानी है जिसके तार पिछले सीजन के आतंकवादी मिशन से जुड़े हुए हैं। 


 गैस काण्ड को अपनी असफलता मानने वाला श्रीकांत तिवारी अब टॉस्क छोड़कर एक आई टी कंपनी में नौकरी कर रहा है। जिससे वो अपने परिवार के साथ कुछ समय बिता सके। वो काम जरुर आई टी कम्पनी में करता है लेकिन उसका दिल - दिमाग अभी भी अपने देश को समर्पित है बीच बीच में वो तलपड़े से टास्क की जानकारी भी लेता रहता है। तभी उसकी जिंदगी में कुछ ऐसा घटता है जिससे वो फिर मिशन से जुड़ जाता है।  एक ओर श्रीकांत को अपनी बेटी को बचाना होता है तो वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री पर होने वाले अटैक की साजिश को नाकाम करना होता है। ऐसे में क्या श्रीकांत अपने मिशन के साथ-साथ अपनी बेटी को सुरक्षित घर वापस ला पाता है। यही सब दिखाया है इस सीरीज में।


कहानी --"द फैमिली मैन " के निर्देशक राज और डीके ने इस बार भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। पिछली बार श्रीकांत तिवारी की लड़ाई  आतंकवाद‍ियों से थी। वहीं इस बार उनकी लड़ाई तमिल श्रीलंकन बागी सरकार से है। ये बागी खुद को क्रांतिकारी मानते है और अपने लोगों को सत्ता में लाने और अपने करीबियों का बदला लेने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हैं। इन बागियों में एक महिला बागी है राजी (समंथा अक्किनेनी) , बचे हुए तमिल बागियों में राजी एक अकेली ऐसी पायलट है जो प्लेन उड़ाना जानती है और जो जरूरत पड़ने पर लोगों के हाथ पैर भी तोड़ - मोड़ सकती है ,उन्हें मौत के घाट उतार सकती है । इस मिशन की पूरी जिम्मेदारी उसी के कंधो पर है।  प्रधानमंत्री बसु (सीमा बिस्वास) और श्रीलंका के राष्ट्रपति दोनों देश के बीच एक अहम  समझौत होना है। इसके लिए श्रीलंका की सरकार बागियों के एक खास व्यक्ति की मांग करती है। प्रधानमंत्री बसु उस बागी  सदस्य को ढूंढ़ने का काम एजेंसी को सौंप देती है। एजेंसी उस सदस्य को ढूंढ तो लेती है पर उसे श्रीलंका को सौंपने से पहले ही एक बम धमाके में उसकी मौत हो जाती है।इस बागी की  मौत के बाद उसका भाई जो कि बागी गुट का लीडर है बुरी तरह तिलमिला जाता है और  आतंकवादी समीर (दर्शन कुमार) से हाथ मिला लेता है।अब इन दोनों का मकसद अब प्रधानमंत्री बसु और श्रीलंका के राष्ट्रपति की मुलाकात को मौत में बदलने का है। 

वहीं दूसरी ओर श्रीकांत तिवारी अब एक आईटी फर्म में काम करने लगा है।  लेक‍िन उसके मन में अब भी एजेंसी में चल रहे म‍िशन को जानने की उत्सुकता लगी रहती है। तभी कुछ ऐसा घटता है कि तिवारी फिर से मिशन से जुड़ जाता है। 


अभिनय --

मनोज बाजपेयी के बारें में क्या कह सकते हैं हमेशा की तरह ,उन्होंने शानदार काम किया है हाँ गालियाँ बहुत दी है इसमें उन्होंने। दर्शक इस सीरीज को उनके ही कारण देखते हैं। समंथा अक्किनेनी ने तमिल बागी के रूप में बहुत शानदार काम किया है। एक्शन बहुत ही उम्दा किये हैं उन्होंने। उन्हें शायद इस सीरीज में इसलिए लिया है जिससे इस शो को  तमिल और तेलुगु दर्शक भी मिले और दूसरी क्या वजह हो सकती है उन्हें इस सीरीज में लेने की ,समझ नहीं आया क्योंकि हिंदी फिल्मों के दर्शक तो शायद ही उन्हें अच्छे से पहचानते हैं।  उस पर भी उन्हें काले रंग का दिखाया है तो और भी मुश्किल हैं उन्हें पहचानना। जे के तलपड़े के रूप में शारिब हाशमी ने उम्दा काम किया है।  शारिब ने वेब  शो 'असुर' में भी अच्छा काम किया था। मुथु बने रविन्द्र विजय ने भी दर्शकों को अपने अभिनय से प्रभावित किया है।शरद केलकर ने क्यों इस सीरीज में काम किया पता नहीं। ९ एपिसोड में मुश्किल से वो २ - ३ बार ही दिखे हैं। पिछली बार ही कुछ ऐसा ही था। शरद से ज्यादा से तो इसमें श्रीकांत तिवारी की बेटी बनी धृति तिवारी ( अश्लेषा ठाकुर )  का काम है। अश्लेषा ने काम भी अच्छा किया है  प्रियमणि, सीमा बिस्वास, दलीप ताहिल, दर्शन कुमार  ,सनी हिंदुजा सभी ने अपना अपना काम बखूबी किया है।

निर्देशन--

राज एंड डीके ने  "फॅमिली मैन - २ " को भी बहुत ही अच्छे तरीके से निर्देशित किया है। हाँ इस बार कुछ एपिसोड को निर्देशित करने का मौका संवाद लेखक सुपर्ण एस वर्मा को भी मिला है।  जब यह शो प्रसारित हुआ था तब शो के शुरू में तमिल भाषा को समझने में थोड़ी परेशानी जरूर हुई  थी लेकिन बाद में दर्शकों की परेशानी को देखते हुए हिंदी में भी सब टाइटल आ गये हैं जिससे अब दर्शकों को यह समस्या दूर हो गई है। कहीं कोई बोरियत नहीं होती इस सीरीज को देखने में। अगर आपने पिछला सीजन नहीं देखा तो उससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इस बार नया मिशन दिखाया गया है।  लेकिन आप को पहला सीजन भी देखना चाहिए। शरू से आखिरी तक बिना किसी रूकावट के आप दोनों ही सीजन देखना पसंद करेंगे।

सोमवार, 21 जून 2021

विद्या बालन के लिये शेरनी को देखें

हिंदी फिल्म -- शेरनी

रिलीज़ --  प्राइम विडियो 

बैनर -- टी सीरीज 

निर्माता -- भूषण कुमार , किशन कुमार 

निर्देशक -- अमित मसुरकर 

पटकथा और कहानी -- आस्था टिकू 

संवाद --  अमित मसुरकर और यशस्वी मिश्रा   

कलाकार --  विद्या बालन,विजय राज,शरत सक्‍सेना,बृजेंद्र काला,नीरज काबी


फिल्म "शेरनी "  की कहानी है  एक वन विभाग की अफसर की है। जिसे नौ साल से कोई भी प्रमोशन नहीं मिला है।छह साल तक डेस्क पर काम करने के बाद आख‍िरकार बिजासपुर के जंगलों में उसे फील्‍ड जॉब मिली है। जहाँ उसकी पोस्टिंग हुई है वहाँ पास के गाँव में एक शेरनी का आंतक छाया हुआ है जिससे गाहे - बगाहे गाँव के लोगो की जाने जा रही हैं। अब उस अफसर के राह में बहुत सारी परेशानियाँ हैं एक ओर वो गाँव वालों को बचाना चाहती है तो दूसरी ओर वो शेरनी को भी बचाना चाहती है। जबकि इसी बीच चुनाव भी हैं और राजनितिक पार्टियाँ इस शेरनी को भी अपना मुद्दा बनाकर वोट मांग रही हैं। अपने सीनियरों और एक शिकारी आदि  से भी वो अफसर जूझ रही है। 
 २ घण्टा १० मिनट की अवधि की यह फिल्म १८ जून को प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हुई है। विद्या बालन की पिछली फिल्म "शकुन्तला देवी " भी २०२० में प्राइम वीडियो पर ही रिलीज़ हुई थी। विद्या ने ( विद्या विंसेंट ) फारेस्ट अफसर के रूप में शानदार अभिनय किया है। न्यूटन फेम निर्देशक अमित मसुरकर ने इस फिल्म को भी बहुत ही खूबसूरती के साथ बनाया है। हाँ कभी - कभी यह फिल्म वृतचित्र जैसी लगती है। लेकिन फिर भी रोमांच बना रहता है,  उत्सुकता बनी रहती है कि क्या शेरनी को बचाने में कामयाब होगी फारेस्ट अफसर विद्या क्योंकि सारा महकमा तो चाहता है कि किसी भी तरह से  टी १२ शेरनी को  जान से मार दिया जाये जबकि विद्या और उसके कुछ साथी चाहते हैं कि किसी भी तरह शेरनी को बचा कर जंगल पँहुचा दिया जाये।  हालाँकि कुछ द्रश्य ऐसे हैं जिनकी फिल्म में जरूरत नहीं थी। फिल्म में जैसे -- जैसे शेरनी की तलाश शरू होती है ऐसा लगा है कि हम भी किसी जंगल सफारी में यात्रा कर रहे हैं। फिल्म के कई संवाद भी बहुत ही लाजवाब और सच्चाई से जुड़े हुए हुए हैं।  विद्या के बॉस बंसल की भूमिका में बृजेन्द्र काला ने  अच्छा काम किया है। इसी तरह प्रोफेसर हसन नूरानी (विजय राज) , सीनियर अध‍िकारी नांगिया (नीरज काबी)  शिकारी पिंटू भैया (शरत सक्सेना ) ने अच्छा अभिनय किया है। सिनेमेटोग्राफर राकेश हरिदास के कैमरे ने कमाल का काम किया है। अनीश जॉन का साउंड डिजाइन भी उम्दा है। इस फिल्म में एक नहीं बल्कि २ शेरनी हैं जिन्हे दर्शकों को अवश्य ही देखना चाहिए।  इस फ़िल्म को दर्शक विद्या बालन की वजह से पसन्द करेंगे।  

सोमवार, 14 जून 2021

सनफ्लॉवर की खुशबू ज्यादा दूर तक नहीं फैल पायी

 ११ जून को ज़ी ५ पर प्रीमियर हुआ वेब सीरीज "सनफ्लॉवर" का। लेकिन इस सनफ्लॉवर की खुशबू ज्यादा दूर तक नहीं फैल पायी।  जबकि उम्मीद थी कि इसकी महक दर्शकों के दिलो दिमाग पर छा जायेगी क्योंकि इससे जुड़े हैं लोकप्रिय अभिनेता सुनील ग्रोवर और विकास बहल। सुनील को हम सभी ने मशहूर गुलाटी , गुत्थी , रिंकू भाभी और भी कई किरदारों  में देखा है और जहाँ तक विकास बहल की बात करें तो उन्होंने क्वीन और सुपर ३० जैसी फ़िल्में बनाई हैं। विकास बहल ने "सनफ्लॉवर" से ओ टी टी पर अपनी शुरुआत की है जबकि सुनील "तांडव" वेब सीरीज से अपनी शुरुआत कर चुके हैं। सुनील ग्रोवर के साथ - साथ इस सीरीज में रनवीर शौरी , गिरीश कुलकर्णी , आशीष विद्यार्थी , शोनाली नागरानी और सोनल झा हैं। 

 'सनफ्लॉवर' एक मर्डर मिस्ट्री है। मुंबई की एक सोसायटी है  "सनफ्लॉवर" जिसमें एक हत्या हो जाती है। जिसकी जाँच पुलिस करती है।पुलिस सोसायटी  वालों ,उसमें काम करने वालों से  पूछताछ करती है। पुलिस की पूछताछ के साथ - साथ  शो में यह भी दिखाया है कि किस तरह मुंबई की सोसायटी में घर लेने के लिए लोगो की सोसायटी के सामने इंटरव्यू देना पड़ता है अगर आप उनके सोच के मुताबिक़ खरे उतरते हैं तो आपको प्लैट मिल जायेगा नहीं तो आप अपना रास्ता नापें यानि समाज के ठेकेदार अपने हिसाब से यह तय करेगें  कि कौन उनके साथ रह सकता है और कौन नहीं। फिल्म वाले, मॉडल , तलाकशुदा ,बैचलर को घर मिलना बहुत मुश्किल है। यह सब इसमें दिखाया है। 

८ एपिसोड वाली इस वेब सीरीज के कुछ एपिसोड तो अच्छे लगते है देखने में लेकिन फिर बाद में कहानी कुछ भटक जाती है क्राइम - थ्रिलर से उबाऊ कहानी बन जाती है। सोनू सिंह बने सुनील ग्रोवर भी हास्य ही करने लगते हैं। सुनील ग्रोवर के किरदार को भोला-भाला मगर कामयाब सेल्समैन दिखाया गया है। हमेशा मुस्कुराता रहता है। ना गुस्सा करता है, ना विचलित होता है। चाहे जो हालात हों। सुनील ने अपने किरदार को पूरी ईमानदारी के साथ निभाया है।उनका किरदार ही ऐसा है कि सब कुछ होते हुए भी उनके पास कुछ भी नहीं है। उन्हें देखकर दर्शकों को हँसी ही आती है क्योंकि उन्होंने   अपने किरदारों से दर्शकों को हँसाया ही है। हालाँकि "तांडव " में उनका किरदार अलग था। सुनील के किरदार को हम बुरा नहीं कह सकते क्योंकि उन्हें तो जैसा निर्देशक ने कहा  वैसा अभिनीत कर दिया यहाँ कमी है लेखक की। 

इंस्पेक्टर दिगेंद्र  बने रणवीर शौरी  , रंगीन मिज़ाज और हमेशा मोबाइल फोन को उंगलियों पर नचाने वाले इंस्पेक्टर तांबे के किरदार में गिरीश कुलकर्णी दोनों ने अच्छा काम किया है। इसके साथ काम वाली बाई ( अन्नपूर्णा ) आशीष विद्यार्थी और डॉ आहूजा (मुकुल चड्ढा  ) का काम भी अच्छा है। राहुल सेनगुप्ता का निर्देशन भी ठीक ही है। 

अभी "सनफ्लॉवर" की मर्डर मिस्ट्री सुलझी नहीं है देखते हैं कि दूसरा सीजन कब आयेगा।  



बुधवार, 9 जून 2021

दर्शकों को पसंद आयेगी "महारानी। "

  सोनी लिव पर प्रसारित वेब सीरीज "महारानी " की इन दिनों बहुत चर्चा है क्योंकि एक तो यह बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के राजनीति में आने की कहानी पर आधारित है। दूसरी राबड़ी देवी की भूमिका को अभिनेत्री हुमा कुरैशी ने बहुत ही शानदार तरीके से अभिनीत किया है। हालाँकि कभी कभी बिहार की भाषा बोलने में सभी कलाकारों से थोड़ी चूक भी हुई है। 


सुभाष कपूर द्वारा रची गयी और लिखी गयी "महारानी " को निर्देशित किया है करण शर्मा ने ।  सुभाष कपूर वहीं हैं जिन्होंने फंस गया रे ओबामा, जॉली एल एल बी २०१३  और जॉली एल एल बी २०१७ , मैडम चीफ मिनिस्टर आदि फिल्मों को लिखा और निर्देशित किया था। सुभाष ने फिल्म "मैडम चीफ मिनिस्टर" के बारें में भी यही कहा था कि यह फिल्म किसी राजनितिक व्यक्तित्व से मेल नहीं खाती जबकि जिसने भी यह फिल्म देखी सब समझ गये यह फिल्म उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य मंत्री मायावती की जिंदगी पर आधारित थी। यही सब उन्होंने इस फिल्म के साथ भी किया है।  

१० एपिसोड की इस सीरीज की शुरुआत होती है बिहार के मुख्य मंत्री भीमा भारती (सोहम शाह ) को गोली लगने से होती है।  भीमा अपनी जगह अपनी अनपढ़ पत्नी रानी भारती ( हुमा कुरैशी ) को बिहार के मुख्यमंत्री पद पर बैठा देते हैं। रानी को ठीक से बोलना भी नहीं आता। किस तरह हकलाते हुए वो पद की शपथ लेती है और दस्तखत की जगह अपना अंगूठा लगाती है। विपक्ष के नेता नवीन कुमार (अमित सयाल ) रानी का जीना मुश्किल करते हैं।

 "महारानी " में बिहार की राजनीति के वो सभी रंग देखने को मिलेगें जोकि असली राजनीति में लोगों ने देखें और सुनें हैं। जिनकी  बिहार के राजनीतिक इतिहास में रुचि है। उन्हें यह अवश्य पसंद आयेगी। इसमें जहां आर्थिक मुश्किलों और जातीय संघर्ष में फंसे राज्य की मुख्यमंत्री की कुर्सी की कहानी के साथ दलित-सवर्ण संघर्ष है। वहीं अपनों के और विरोधियों के षड्यंत्र हैं।  अफसरों की चापलूसी और चालें हैं। विधानसभा में बहुमत और अल्पमत की सौदेबाजी है।  नक्सल और पुलिस है। हत्याएं और सिस्टम के घोटाले हैं और सबसे ज्यादा लोकप्रिय चारा घोटाला भी है। "महारानी" में नेता पक्ष - विपक्ष तो क्या राजपाल भी पूरी तरह से भ्र्ष्ट दिखाया है।  


१० एपिसोड है इस सीरीज के लेकिन फिर भी मन कहीं भटकता नहीं है।  दर्शकों को पसंद आयेगी "महारानी। "




बुधवार, 26 मई 2021

ओ टी टी पर छाई परिणीति चोपड़ा


इन दिनों ओ टी टी पर अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा छाई हुई हैं क्योंकि फरवरी और मार्च के २ महीनों में उनकी ३ फ़िल्में दर्शक देख रहे हैं और पसंद कर रहे हैं। पहली फिल्म थी उनकी नेट फ्लिक्स पर प्रसारित "द गर्ल ऑन द ट्रेन "  जो कि फरवरी २०२१ में रिलीज़ हुई। इस मर्डर मिस्ट्री में परिणीति मुख्य भूमिका में हैं। उनके साथ इस फिल्म में अविनाश तिवारी , अदिति राव हैदरी और कीर्ति कुल्हाड़ी हैं। यह फिल्म  ब्रिटिश लेखक पौला हॉकिंस की किताब पर आधारित है। निर्देशक ऋभु दासगुप्ता की इस फिल्म में परिणीति ने एक वकील की भूमिका अभिनीत की है। मीरा कपूर को उसका पति उसे  धोखा देता है और किस तरह से उसे हत्या के जुर्म में फँसा देता है ? किस तरह से मीरा खुद को बेकसूर साबित करती है।  यही सब दिखाया है इस फिल्म में । अच्छा अभिनय किया है परिणीति ने। 
दूसरी फिल्म है "सायना " जो कि लोकप्रिय बैडमिंटन खिलाड़ी की उपलब्धियों पर बनी फिल्म है. वैसे तो यह फिल्म थियेटर में ही पहले रिलीज़ हुई थी।  लेकिन ज्यादातर दर्शकों ने इस प्राइम वीडियो पर ही देखा है।  निर्देशक अमोल गुप्ते की इस फिल्म के लिए अभिनेत्री परिणीति ने मेहनत तो बहुत की है लेकिन खिलाड़ी सायना से उनके शरीर की बनावट मिलती नहीं तो वो कुछ फिल्म में दर्शकों को कम पसंद आया है।  फिर भी यह फिल्म आप परिणीति के लिए नहीं लेकिन सायना नेहवाल के लिए देख सकते हैं। 

परिणीति की तीसरी फिल्म है "संदीप और पिंकी फरार " इस फिल्म का नाम  थोड़ा अजीब है लेकिन फिल्म की कहानी अच्छी है।  यशराज बैनर की इस फिल्म के निर्देशक है दिबाकर बनर्जी ,तो आप समझ सकते हैं कि कैसी फिल्म होगी। परिणीति और अर्जुन कपूर हैं मुख्य भूमिका में। दोनों ने ही अच्छा अभिनय किया है. कह सकते हैं कि अब तक की सभी  आयी फिल्मों में  बेहतरीन अभिनय किया है दोनों ने  इस फिल्म में।  परिणीति यानि संदीप -- सैंडी ,जहाँ एक बैंक की उच्च प्रतिनिधि बनी हैं वहीं अर्जुन सत्येंद्र -- पिंकी , हरियाणा पुलिस में हैं। दोनों के बीच किसी प्रकार की कोई मोहब्बत नहीं है फिल्म और नहीं किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध। यह फिल्म भी आप प्राइम विडियो पर देख  सकते हैं आपको अच्छी लगेगी। अन्य कलाकारों में जयदीप अहलावत , नीना गुप्ता और रघुवीर यादव हैं। 

मंगलवार, 25 मई 2021

दर्शकों को पसंद  आयेगा ऑउट ऑफ़ लव - २ 

 पूरब कोहली और रसिका दुग्गल अभिनीत डिज़्नी प्लस हॉटस्टार की चर्चित सीरीज़ "आउट ऑफ़ लव" अपने दूसरे सीज़न के ५ एपिसोड के साथ एक बार फिर दर्शकों के सामने है। पहला सीजन २०१९ में नवम्बर  में आया था और दूसरा सीजन २०२१ के  अप्रैल -- मई महीने में आया है। पहला सीजन भी दर्शकों ने खासा पसंद किया था और निस्संदेह दूसरा भी पसंद करेगें। ब्रिटिश रोमांटिक-थ्रिलर सीरीज़ डॉक्टर फॉस्टर पर आधारित इस शो के पहले सीजन को निर्देशक किया था तिग्मांशु धूलिया और ऐजाज़ खान ने जबकि दूसरे सीजन के निर्देशक हैं लोकप्रिय अनिरुद्ध सेन।  कलाकारों में कोई बदलाव नहीं किया है। पूरब कोहली और रसिका दुग्गल ने सशक्त अभिनय से दर्शकों का पूरा मनोरंजन किया है। "आउट ऑफ़ लव" के दूसरे सीजन में शुरू के दो एपिसोड ३० अप्रैल को प्रसारित हुए जबकि बाकी हर सप्ताह में प्रसारित किये गये हैं। 


इस शो की कहानी है आकर्ष  ( पूरब कोहली ) और डॉ मीरा कपूर ( रसिका दुग्गल ) की , जो की पति पत्नी थे। आकर्ष ने अपनी पत्नी मीरा से बेवफाई की और अपने से उम्र में काफी छोटी लड़की आलिया ( मीनाक्षी चौधरी ) से मोहब्बत की और उसके साथ दिल्ली चला गया । दिल्ली में उसने आलिया जो कि बहुत अमीर घर की बेटी है उससे शादी की। 

दूसरे सीजन में दिल्ली गया आकर्ष अपनी पत्नी आलिया और छोटी बच्ची के साथ ३ साल बाद इस इरादे से लौटा है कि मीरा कपूर से उसका जो बेटा है अभिषेक उसे अपने  पास रखना है और मीरा को इस कदर सताना है कि वो परेशान होकर कुनूर छोड़कर चली जाये। दोनों ही पति पत्नी अपने बेटे अभिषेक को अपने पास रखने के हर हथकंडे अपनाते हैं। आखिरी में अभिषेक किसके पास रहता है और इन तमाम  घटनाओं के बीच अभिषेक  और आलिया किन मानसिक परिस्थितियों से गुज़रते हैं यह तो देखने लायक है ही। 

जिन दर्शकों ने पहला सीजन नहीं देखा  है वो भी दूसरे सीजन को पसंद करेगें क्योंकि पूरब कोहली और रसिका दोनों ने  ही अच्छा अभिनय  किया है। इन दोनों के अलावा अन्य कलाकार हैं  कचरू,  विश्वस किनी, आइशा चोपड़ा, हर्ष छाया आदि।  तेलंगाना के कुनूर में शो की शूटिंग की गयी है। देखने में बहुत ही खूबसूरत है कुनूर। शो देखने के बाद आपका भी मन करेगा कि कुनूर में बस जायें। 


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गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

समीक्षा -- हिंदी फिल्म --पगलैट

 समीक्षा -- हिंदी फिल्म  --पगलैट 



रिलीज़ -- नेटफ्लिक्स पर 
निर्माता  -- शोभा कपूर , एकता कपूर , गुनीत मोंगा और अचिन जैन 
लेखक और निर्देशक -- उमेश बिष्ट 
कलाकार -- सान्या मल्होत्रा , आशुतोष राणा ,रघुवीर यादव , राजेश तैलंग , शीबा चड्डा , सयानी गुप्ता 
संगीत -- अरिजीत सिंह 
गीत -- नीलेश मिश्रा , रफ़्तार 
आवाज़ --अरिजीत सिंह ,सन्नी आर , हिमानी कपूर ,अमृता सिंह , राजा कुमारी ,रफ़्तार , अन्तरा मित्रा , झुम्पा मंडल ,चिन्मयी श्रीपदा , मेघना मिश्रा , सुमाना बनर्जी  

पिछले दिनों ने नेटफ्लिक्स पर  फिल्म " पगलैट" रिलीज़ हुई है। जिसकी कहानी है संध्या (सान्या मल्होत्रा ) की , जिसकी शादी अभी पांच महीने पहले ही हुई थी आस्तिक  से। आस्तिक की मृत्यु हो गयी है और उसकी तेहरवीं के लिए  रिश्तेदार जुड़ना शुरू हो गए है लेकिन संध्या को पति के मरने का गम नहीं है। आम लड़कियों की तरह नहीं वो रो रही है न ही कुछ ख़ास परेशान है। क्योंकि आस्तिक से उसे कुछ ज्यादा लगाव भी नहीं हो पाया था उसे तो चिप्स खाने है , कोल्ड ड्रिंक पीना है और घर से बाहर जाकर उसे गोल गप्पे खाने है। आस्तिक बहुत अच्छा था उसने नया  घर लिया था उसकी किश्तें जानी थी अब वो मर गया है तो कैसे लोन की सारी किश्तें जायेंगी , घर खर्च कैसे चलेगा , तेहरवीं का खर्चा भी बहुत हो रहा है कहाँ से कैसे यह सब होगा ?  इसी सोच में आस्तिक के पिता  शिवेंद्र गिरी ( आशुतोष राणा ) और उसकी माँ उषा ( शीबा चड्डा ) परेशान हैं लेकिन उन्हें अपनी बहू संध्या की भी बहुत चिंता है। आस्तिक ने मरने से पहले ५० लाख का बीमा किया था जिसकी नॉमिनी है संध्या। अब आस्तिक के मरने के बाद सारा पैसा संध्या को ही मिलेगा। जिससे संध्या के माँ - पापा खुश है जो संध्या को घर वापस नहीं ले जाना चाहते थे क्योंकि उनकी दो बेटियाँ और भी है जिनकी शादी भी करनी हैं। लेकिन जैसे ही संध्या को ५० लाख मिलने की बात होती है वो भी अपनी बेटी को अपने घर ले जाना चाहते हैं इसी तरह आस्तिक के चाचा भी संध्या की शादी अपने बेटे के साथ करना चाहते हैं। इसी बीच संध्या को आस्तिक की अलमारी से एक लड़की आकांशा रॉय ( सयानी गुप्ता ) की फोटो मिलती है। जब आस्तिक के ऑफिस के लोग शोक मनाने घर आते हैं तो उनमें आकांशा भी होती है अब संध्या आकांशा और आस्तिक के बारें में सब कुछ पूछती है और आस्तिक से भी नफरत होने लगती है। इसी तरह तेरहवीं का दिन भी आ जाता है संध्या तेहरवीं में सबके साथ हिस्सा लेती है और एक चिट्टी अपनी माँ के नाम ,एक चिट्टी अपनी सास के नाम छोड़ कर  घर से चली जाती है और फिर यही खतम होती है फिल्म एक अच्छे संदेश के साथ। 

तेरहवीं के इर्द गिर्द कई फ़िल्में बन चुकी हैं लेकिन यह फिल्म कुछ अलग है क्योंकि इसमे संध्या का किरदार अलग है। आखिर के कुछ संवाद भी दिल को छू लेते हैं हैं जैसे --" जब लड़की लोग को अक्ल आती है तो सं उन्हें पगलैट ही कहते हैं।"  लड़कियों की फ़िक्र सब करते हैं लेकिन लड़किया क्या सोचती हैं इसकी फ़िक्र कोई नहीं करता " इसी तरह दो - एक और भी हैं। 
सान्या मल्होत्रा , आशुतोष राणा , शीबा चड्डा , रघुवीर यादव आदि सभी ने अच्छा अभिनय किया है।देखने लायक फिल्म है। एक बार जरूर देखें। 

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

फिल्म "कागज़ " में कुछ अगर कुछ देखने लायक है तो वो हैं पंकज त्रिपाठी

 हिंदी फिल्म -- कागज़
रिलीज़ ---  ज़ी ५ पर
लेखन और निर्देशन  -- सतीश कौशिक
निर्माता --  सलमान खान , निशांत कौशिक , विकास मालू  
कलाकार -- पंकज त्रिपाठी , मोनल गज्जर ,सतीश कौशिक
संगीत -- प्रवेश मल्लिक , राहुल जैन

कागज़ की अहमियत हमारे जीवन में क्या है ? यह बात हमें तब पता चलती है जब हम सरकारी काम से किसी दफ्तर में जाते हैं। अगर सरकारी कागजो में जीवित इंसान भी मरा हुआ दिखाई दे तो सोचिये उस व्यक्ति के जीवन में कितना उथल - पुथल होगा। यह फिल्म "कागज़" भी एक सच्ची कहानी पर आधारित है।  यह कहानी है उस लाल बिहारी मृतक नाम के व्यक्ति की। जिसने  18 साल के लंबे संघर्ष के बाद खुद को जीवित साबित किया।

कहानी-- उत्तर प्रदेश के खलीलाबाद के एक छोटे से गाँव में रहने वाला भरत लाल ( पंकज त्रिपाठी ) एक बैंड मास्टर है।  वो अपनी छोटी सी दुनियाँ में खुश हैं। भरत लाल की पत्नी रुक्मणि (मोनल गज्जर )  उस अपना काम बढ़ाने के लिए बैंक से लोन लेने के कहती है।  पत्नी की बात सुनकर भरत लाल  बैंक जाता है, जहाँ उसे पता चलता है अगर उसके नाम कोई जमीन है तो उसे गिरवी रख कर बैंक उसे कर्ज दे सकता है। यह सुनकर वो बहुत खुश होता है और अपने पुश्तैनी जमीन के कागज़ लेने अपने गाँव जाता है जहाँ  उसे पता चलता है कि उसके चाचा , चाची ने उसे मरा हुआ घोषित कर उसकी जमीन अपने बेटों के नाम लिखवा ली है। जब वो  लेखपाल के पास जाता है तब उसे पता चलता है कि कागज़ो में तो कब का मर चुका है बस यही से अपने को जीवित साबित करने का उसका संघर्ष शुरू हो जाता है। इस बीच उस पर बहुत कुछ गुजरता है।  भरत लाल को १८ साल लग जाते हैं इस साबित करने में कि वो जिन्दा है मरा नहीं। 

समीक्षा --- फिल्म की कहानी "कागज़ "  में तो बहुत ही मार्मिक लगती है। उस व्यक्ति के प्रति भी सहानुभूति होती है जिसकी जिंदगी में यह भूचाल आया कि जिन्दा होते हुए भी उसे साबित करना पड़ा कि वो जिन्दा है लेकिन फ़िल्म में यह कहीं भी महसूस नहीं होता।  कहीं भी आँखे नम नहीं होती , दिल में दर्द नहीं होता क्योंकि निर्देशन में बहुत कमियाँ हैं।" तेरे नाम" जैसी सुपर हिट  फिल्म बनाई थी सतीश कौशिक ने लेकिन फिल्म "कागज़ " के प्रति उनसे न्याय नहीं हो पाया है।  बहुत धीमी फिल्म है , इसलिए बहुत बढ़ी फिल्म लगती है। बीच बीच में सतीश कौशिक की कमेंट्री बहुत बोर करती है। हाँ फिल्म में अगर कुछ देखने लायक है तो वो हैं पंकज त्रिपाठी। उन्हें देखना अच्छा लगता है। हमेशा की तरह शानदार अभिनय किया है उन्होंने साथ में उनकी पत्नी बनी मोनल ग़ज़्ज़र ने भी अच्छा काम  किया है। 
 

सोमवार, 11 जनवरी 2021

कैसे एक कलाकार और एक निर्देशक एक दूसरे की बेइज्जती करते हैं यह देखना हो तो यह फिल्म अवश्य देखें -- "एके वर्सेज एके"

हिंदी फिल्म  -- एके वर्सेज एके 
रिलीज़ -- नेट फ्लिक्स पर 
निर्माता -- दीपा डे मोटवाने 
निर्देशक -- विक्रमादित्य मोटवानी 
संवाद -- अनुराग कश्यप 
स्क्रीन प्ले -- अविनाश सम्पत , विक्रमादित्य मोटवानी 
कहानी --  अविनाश सम्पत
कलाकार -- अनिल कपूर , अनुराग कश्यप , सोनम कपूर , हर्षवर्धन कपूर 

"एके वर्सेज एके" यह फिल्म नेट फ्लिक्स पर रिलीज़ हो चुकी है। इस फिल्म की ख़ास बात यह है कि इस फिल्म में हर किसी ने अपना असली किरदार अभिनीत किया है यानि अनिल कपूर अनिल कपूर ही बने हैं और निर्देशक अनुराग कश्यप निर्देशक अनुराग कश्यप ही बने हैं। फिल्म के अंदर एक फिल्म जो चल रही है उसकी कहानी है अभिनेता अनिल कपूर की।  कई साल पहले निर्देशक अनुराग कश्यप अभिनेता अनिल कपूर को लेकर एक फिल्म "आल्विन कालीचरण " बनाना चाहते  थे लेकिन अनिल कपूर की वजह से उनकी यह फिल्म बन नहीं सकी क्योंकि अनिल कपूर उनके साथ काम नहीं करना चाहते थे , तो इसका बदला लेने के लिये वो अनिल कपूर की बेटी अभिनेत्री सोनम कपूर का अपहरण कर लेते हैं अब अनिल कपूर के पास १०  घंटे का वक्त का है अपनी बेटी को ढूँढने का। अब अनिल कपूर अपनी बेटी को बौखलाये सब जगह ढूँढ़ते हैं वो सब अनुराग की सहायक योगिता सब अपने कैमरे में रिकॉर्ड कर रही है।  

समीक्षा -- यह अलग तरह की फिल्म है यानि फिल्म में सब कुछ वास्तविक है। इस तरह की फ़िल्में आम तौर पर हमारे यहाँ नहीं बनती ,तो कह सकते हैं कि अलग तरह का एक प्रयोग है फिल्म बनाने का। लेकिन फिल्म देखने में जरा भी मज़ा नहीं आता। कुछ अगर अच्छा है फिल्म में तो वो हैं अनिल कपूर। उन्हें हर फ्रेम में देखना अच्छा लगता है। अनुराग कश्यप भी ठीक ही लगे हैं।  अनिल के बेटे हर्षवर्धन ने बहुत ही बुरा अभिनय किया है। उन्हें बस गाली देने के लिए ही लाया गया है फिल्म में।  सोनम कपूर का कुछ काम नहीं था फिल्म मे।  कैसे एक कलाकार और एक निर्देशक एक दूसरे की बेइज्जती करते हैं यह देखना हो तो यह फिल्म अवश्य देखें।