शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

तमाशा में भी वही कहानी क्यों ?

जैसा कि फिल्म तमाशा की टैग लाईन है "वाये ऑलवेज द सेम स्टोरी -- तमाशा " यह बात फिल्म "तमाशा ' पर पूरी तरह से सही लागू होती है. लेकिन दर्शक पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक निर्देशक इम्तियाज़ अली वही कहानी दोहराते रहेगें अपनी फिल्मों में। कई बार फिल्म #तमाशा उनकी पिछली फिल्मों #रॉक स्टार  #जब वी मेट #हाईवे   की याद दिला रही थी। 

बीच - बीच में कुछ  - कुछ उलझी हुई सी कहानी है। एक कहानी के माध्यम से फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है. अगर सीधे ही कहानी आगे बढ़ती तो भी अच्छा रहता है. शायद निर्देशक ने कुछ अलग तरह से पुरानी कहानी को दिखाने के चक्कर में ऐसा किया हो। निर्देशक इम्तियाज़ अली की फिल्मों का सभी दर्शकों को इंतज़ार रहता है क्योंकि उनकी फिल्मों में फिल्मांकन हमेशा अलग तरह से होता है जबकि कहानी " ऑलवेज द सेम स्टोरी".
पी वी आर सिनेमा सिटी मॉल अँधेरी वेस्ट, मुंबई में सुबह १० -४५ का शो और बहुत समय बाद देखा कि पहली सीट से आखिरी सीट तक सारा का सारा फुल। यह निर्देशक इम्तियाज़ अली और #रणबीर  #दीपिका की जोड़ी का क्रेज़ था शायद लेकिन अच्छा लगा इस तरह से थियेटर को भरा हुआ देख कर.  रणवीर और दीपिका दोनों ही अच्छे लगे हैं।  रणबीर  तो इतने अच्छे अभिनेता हो गये है 'रॉक स्टार" के बाद कि उन्हें बस देखते ही जाओ यही मन करता है।   

कोर्सिका (फ्रांस) की ख़ूबसूरती निस्संदेह दर्शकों को अपने ओर खींचने में कामयाब हुई है और जो भी भारतीय टूरिस्ट वहां जायेगें उसका सारा श्रेय इस फिल्म को ही जायेगा। फिल्म में मेरी सीट के पीछे वाले दर्शक तो जरूर ही वहां जायेगें क्योंकि जब - जब परदे पर कोर्सिका दिखाया गया उन्होंने कोर्सिका की ख़ूबसूरती की तारीफ की। 



सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

पूरी तरह ऐश की फिल्म है जज़्बा

फिल्म #जज़्बा  १२ अक्टूबर #फन सिनेमा, दोपहर १२ बजकर ४० मिनट का शो, २० प्रतिशत दर्शक।  ९ अक्टूबर को रिलीज़ हुई निर्देशक संजय गुप्ता की फिल्म #जज़्बा ने सप्ताहान्त में १५. २४ करोड़ की कमाई की।  ५ साल के बाद इस फिल्म "जज़्बा" से  अभिनेत्री ऐश्वर्या रॉय बच्चन  दोबारा दर्शकों के सामने आयी।  साउथ कोरियन फिल्म #सेवन डेज की रीमेक यह फिल्म पूरी तरह ऐश की फिल्म है फिल्म के हर सीन में वो दिखाई देती हैं।  
संजय गुप्ता हमेशा एक्शन और थ्रिलर फ़िल्में ही बनाते हैं और उनकी पिछली अधिकतर फ़िल्में किसी न किसी फिल्म का  रीमेक ही रही हैं।  हालांकि फिल्म दर्शकों को आखिरी तक बांधे रखती हैं सस्पेंस भी अच्छा है लेकिन वकील बनी ऐश्वर्या कहीं से भी वकील नही लगती ऐसा लगता है जैसे उन्होंने पुलिस की ट्रेनिंग ले रखी है। फिल्म के एक दृश्य में  जब वो कोर्ट में हैं तो सबसे पहले वो अपने हाई हील शूज़ पहनती हैं इस सीन से  निर्देशक संजय गुप्ता क्या दिखाना चाह रहे थे पता ही नही चला।  इसके अलावा भारतीय कोर्ट में कब से टाइट जींस पहनने लगी महिला वकील। जिस तरह से वो अपनी बेटी के अपहरण कर्ताओं के पीछे भागती हैं  और केस लड़ने के लिये मारपीट भी करती हैं, देखकर अच्छा लगता है। बलात्कार के बाद लड़कियों की हत्या जो कि आज हमारे देश में आम खबर हो गयी है. इस दुर्घटना को भी फिल्म से जोड़ा  गया है।   

 परदे पर जब जब इरफ़ान  आते हैं दर्शकों को अच्छा लगता है।  इरफ़ान सस्पेंड इन्स्पेक्टर होकर भी बहुत मदद करते हैं अपनी दोस्त अनुराधा की, जबकि अपनी कोई मदद नही कर पाते। 

शबाना आज़मी का काम अच्छा है जबकि जैकी श्राफ ने शायद संजय गुप्ता के लिए यह फिल्म की होगी। 
आप चाहे तो ऐश्वर्या के लिये फिल्म #जज़्बा देख सकते हैं। अतुल कुलकर्णी का काम ठीक ठाक है। 


शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

फिल्म "सिंह इज़ ब्लिंग " में सिंह ब्लिंग नही हुआ

फिल्म 'सिंह इज़ ब्लिंग" पी वी आर , सिटी मॉल, अँधेरी ( वेस्ट ) मुंबई।  शनिवार , ३ अक्टूबर सुबह ११ बजे का शो , ७० % दर्शक। 

जो गलती निर्देशक प्रभुदेवा ने अपनी पिछली फिल्म "एक्शन जैक्सन " बनाकर की थी वहीं गलती उन्होंने "सिंह इज़ ब्लिंग" फिल्म  बना कर की है।  न तो यह फिल्म रोमांटिक फिल्म है न ही पूरी तरह से कॉमेडी और न ही एक्शन फिल्म है।  पता नही क्या दिखाना चाहते हैं  इस फिल्म में। जब - जब एमी परदे पर आती हैं एक्शन होता है और जब - जब लारा दत्ता आती हैं कॉमेडी होती है प्रभु ने दोनों काम दोनों नायिकाओं से करवा लिये हैं।  अक्षय के काम तो इन दोनों अभिनेत्रयों ने ही कर लिये इसीलिये उनके हिस्से कुछ काम आया नही. सिवाय अपने पिता की डाँट खाने के।  अच्छे अभिनेता होते हुए भी के के मेनन के हिस्से ऐसा काम आया है जो की कोई भी कर सकता था।  संवाद भी पता नहीं कैसे कैसे बुलवाये हैं जो की उन पर बिल्कुल भी सूट नही करते। उनके हेयर स्टाइल की तरह.  

एमी ने अच्छा एक्शन किया है उन्हें फ़िल्में मिलेंगी , लारा दत्ता ने अलग और अच्छा काम किया है। क्रिकेट खिलाड़ी युवराज के पिता जो कि पंजाबी फिल्मों में अभिनय करते हैं अक्षय के पिता की अच्छी भूमिका अभिनीत की हैं उन्होंने।  

 अक्षय के पिता का संवाद या तो शादी कर ले नही तो गोवा जाकर नौकरी कर ले।  कुछ अजीब है कहानी भी जब तब इधर उधर भटकती है पूरी फिल्म में पीटने वाला अक्षय आखिरी सीन में के के मेनन और उसके आदमियों को उठा उठा फेंकता है और सारी फिल्म में एक्शन करने वाली एमी इस सीन में चुपचाप खड़ी है। फिल्म का एक एक सीन जोड़ो तब कहीं जाकर आधी से भी काम फिल्म देखने लायक ही बनती है।  संगीत भी कुछ दमदार नही है। बस एक गीत "दिल करे चू चै चै चै " में आप फिल्म का पूरा मज़ा ले सकते हैं।  कुल मिलाकर आप समझ सकते हैं कि फिल्म "सिंह इज़ ब्लिंग " में सिंह ब्लिंग नही हुआ।

इससे तो आप २००८ में आयी फिल्म "सिंह इज़ किंग" दुबारा टी वी देख सकते हैं वो फिल्म इस फिल्म से बहुत ज्यादा अच्छी फिल्म थी। #singhisbliing 

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

किस किस को प्यार करूँ में दर्शकों को अपना दिमाग ख़र्च नही करना पड़ेगा

पी वी आर, सिटी मॉल, अँधेरी ( वेस्ट )  मुंबई। सिनेमा घर में ७० प्रतिशत दर्शक।  ३५ करोड़ की कमाई की है अभी तक  कपिल शर्मा की पहली फिल्म "किस किस को प्यार करूँ" ने
फिल्म " किस किस को प्यार करूँ "  में कपिल की  तीन पत्नियां और एक गर्ल फ्रेंड दिखायी हैं तो इन सबके बीच वो कैसे बार - बार फसंता है और उसका वकील दोस्त करन (वरुण शर्मा ) न्यूटन के साइंस लॉजिक से कैसे उसे बचाता है यही सब फ़िल्म है , क्या कभी किसी ने सोचा होगा कि अब्बास मुस्तन जैसे निर्देशक जो कि सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्में बना कर दर्शकों के दिमाग का दही किया करते थे वो आज ऐसी फ़िल्में बनायेगें जिससे दर्शकों को अपना दिमाग ही ख़र्च न करना पड़े। 

वैसे भी आज कल हास्य फिल्मों का मतलब हमारे यहाँ यहीं रह गया है कि हास्य फिल्म देखना है तो आपको दिमाग घर पर रख कर आना चाहिये। कहानी - तर्क किन्तु - परन्तु पर ध्यान नही देना चाहिए  और यही इस फिल्म में भी हुआ है।  इस फिल्म की कहानी कुछ नयी नही है गोविंदा ने तो साजन चले ससुराल , सैंडविच जैसी कई फिल्मों में २ पत्नियों को हैंडिल किया है और दर्शकों को भरपूर हंसाया भी है।  कपिल ने भी कुछ कोशिश की दर्शकों को हँसाने की।  वैसे वह अपने सारे कॉमेडी पंचेज तो कॉमेडी नाईट विध कपिल में प्रयोग में ला चुके हैं।  कुछ इस फिल्म में भी कपिल ने प्रयोग में लायें हैं जैसे बच्चे का जन्म होना।  अरबाज़ खान ने बहरे टाइगर भाई की भूमिका अच्छी की है। कपिल की पत्नियाँ बनी हीरोइनों को दर्शक पहचाने भी नही वो कौन हैं। उनसे ज्यादा तो नौकरानी बनी जॉनी लीवर की बेटी जैमी लीवर ने अच्छा काम किया है।

फिल्म का पहला भाग कुछ सुस्त है , फिल्म का गीत - संगीत भी कमजोर है , बेवजह ही गीतों को फिल्म में रखा गया है। इंटरवेल के बाद फिल्म में कुछ एनर्जी आती है जब शरत सक्सेना और सुप्रिया पाठक आते हैं शरत जब - जब परदे पर आते हैं कोई न कोई पुराना गीत बजता है जिससे दर्शकों को हंसी आती है। एक बार फिल्म देख सकते हैं क्योकि कपिल ने अपने शो के माध्यम से दर्शकों को हँसना सिखाया है तो यह फिल्म तो उनके नाम बनती ही है।  
  

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

कई फिल्मों की कहानियों को मिलाकर बना दी फिल्म कट्टी बट्टी

फन सिनेमा, शुक्रवार १८ सितम्बर, सुबह ११-३५ का शो टाइम फिल्म #कट्टीबट्टी , ७० प्रतिशत दर्शक


 बैक तो बैक दो फ़िल्में "हीरो"  और "कट्टी बट्टी"रिलीज़ हुई निर्देशक निखिल अडवाणी की, लेकिन दोनों ही फ़िल्में दर्शकों को रिझाने में कामयाब नही हो पायी। "कट्टी बट्टी" क्या सोच कर बनायी नहीं पता, पुरानी कहानी पुराना संगीत, इमरान को देख कर तो उनकी कई फिल्मों की यादें ताज़ा हो गयी जैसे वो इस फिल्म में कंगना के पीछे भागते रहते हैं वैसे ही वो फिल्म "ब्रेक के बाद" में दीपिका के पीछे भागते थे। पुरानी फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी कंगना के लिये उसके बॉय फ्रेंड लड़ते रहते हैं. हैं न कुछ अजीब --- 

रुकी हुई सी फिल्म लगती है "कट्टी बट्टी" जिसमें न रोमांस न इमोशंस न दिल को छूने वाले संवाद, उस पर फिल्म के आखिरी में फिल्म में कुछ नया दिखाने के चक्कर में  हीरोइन को कैंसर।  लेकिन फिर भी शायद ही किसी भी दर्शक का दिल पिघला होगा पायल की बिमारी को देख कर. फिल्म में नायिका को कैंसर की बिमारी है यह नायक को छोड़कर बाकी सबको पता है लेकिन कोई बताता नही यह कुछ अजीब लगता है और जिस तरह से पता चलता है वो ड्रामा भी कुछ अजीब है।   मध्यांतर से पहले की फिल्म फिर भी देखी जा सकती है लेकिन बाद की तो बहुत ही लचर है.  

कुछ नया नही है फिल्म में और पुराना भी ऐसे पेश किया है जैसे देखने में मज़ा नही आ रहा। इमरान को देख कर लगता ही नहीं कि हम उनकी कोई नयी देख रहे हों। कंगना ने जरूर कुछ नया करने की कोशिश की है।

दो गाने "लिप टू लिप दे किसियाँ " और "सौं आँसू" ठीक हैं बाकी बेवजह हैं। कंगना की सफलता और बढ़ती लोकप्रियता शायद बचा पाये इस फिल्म को।  

फिल्म देखें या न देखें आपकी मर्जी है , वैसे मुझे तो लगता है फिल्म देखने से ज्यादा अच्छा है गणपति उत्सव में हिस्सा लेंगें तो आप ज्यादा लुत्फ़ उठा सकेगें। 

सोमवार, 14 सितंबर 2015

सलमान ने क्यों बनायी फिल्म हीरो ?

 "हीरो" फिल्म सन १९८३ में रिलीज़ हुई फिल्म का रीमेक है ।  निर्माता निर्देशक सुभाष घई की इस फिल्म ने दो सितारों को फ़िल्मी दुनियाँ में स्थापित किया जिसमें से एक हैं जैकी श्राफ और दूसरी हैं मीनाक्षी शेषाद्रि।  दोनों ने ही अपने अभिनय के बल पर फिल्मों में एक अलग ही मुकाम बनाया।  इस फिल्म नयी फिल्म "हीरो" से भी अभिनेता सलमान  खान ने दो कलाकारों को लॉन्च किया है जिसमें से एक है आदित्य पंचोली के बेटे सूरज पंचोली और सुनील शेट्टी की बेटी अथिया शेट्टी को. 

इंटरवेल से पहले की फिल्म फिर भी देखी जा सकती है लेकिन बाद की फिल्म तो देखना सजा पाने जैसा है निखिल अडवाणी दर्शकों से पिछले जन्म का कोई हिसाब चुका रहे हो ऐसा लग रहा है।  हालांकि पिछली फिल्म से इस फिल्म की तुलना करना बिलकुल सही नही है कहाँ वो फिल्म जिसकी कहानी, कलाकार, संगीत सभी बहुत काबिले तारीफ है कहाँ यह फिल्म जिसमें सभी कुछ लचर है।

 सलमान खान ने अपने गाये गीत "मैं तेरा हीरो " को ही प्रोमोट किया है शायद इसलिए क्योंकि बाकी गीत तो वैसे भी प्रोमोट करने लायक नही है.

सलमान खान फिल्म्स की हर फिल्म "बजरंगी भाईजान" जैसी सफलता हासिल करें यह कोई जरुरी तो नही।  जैसी फिल्म निखिल ने बनायी है वैसी तो सुहैल भी बना देते @beingslmankhan 
इस फिल्म की पिछले तीन दिनों की कमाई करीब २० - २२ करोड़ है।  सोमवार १४ सितम्बर  को फन सिनेमा में दोपहर के शो में दर्शकों  में लड़के -लकड़ियों  की संख्या ज्यादा थी ,कुल मिलाकर दर्शकों की उपस्थिति ३५ % रही।  

सोमवार, 22 जून 2015

बड़े परदे पर डांस का रियल्टी शो --फिल्म "ए बी सी डी -२"

सिने मैक्स, वर्सोवा, मुंबई। सुबह ११. ३० का शो, सुहाना मौसम मुंबई का और टिकट खिड़की का भी,  क्योंकि अब एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग सोमवार और मंगलवार के दिन सुबह फिल्म देखने लगा है शायद इसलिये भी क्योंकि टिकट दर सस्ती होती है. इन दर्शकों में आम दर्शक ही नही होते बल्कि फिल्म और टी वी से जुडी कई जाने - माने चेहरे भी होते हैं. 

टी वी और फिल्म अभिनेत्री #अलका अमीन भी हमारे से आगे वाली लाइन में बैठी फिल्म देख रही थी. जितनी अच्छी वो परदे पर हैं उतनी ही अच्छी ही वो असली जिंदगी में भी हैं क्योंकि जब हमें हॉल सहायक की जरुरत हुई तो वो खुद उसे बुला कर लायीं, बहुत - बहुत धन्यवाद आपका।   

फिल्म की कहानी और स्टार कास्ट के हिसाब से ही पता चल जाता है कि इस फिल्म के दर्शक किस उम्र विशेष के होंगे तो जैसा अनुमान था इस फिल्म में भी युवा दर्शक ही ज्यादा थे। ७० %  सीट भरी थी तो अच्छा लगा देख कर क्योंकि "हमारी अधूरी कहानी " में तो हाल - बेहाल था। सबसे अच्छा यह था की दर्शक हर अच्छे डांस मूव को सराहा भी रहे थे।      

"अगर जो कोई संगीत महसूस कर सकता है वो नाच भी सकता है" बिलकुल सही संवाद है फिल्म "ए बी सी डी - २ " का।  लेकिन किसी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की डांस प्रतोयोगिता जीतने या जिंदगी में एक मुकाम हासिल करने के लिये समर्पण , त्याग और मेहनत की जरुरत होती है।  जिनको डांस में जरा भी रूचि है वो इस फिल्म को पसंद करेगें , हालांकि टी वी पर तो अब डांस रियल्टी शो की भरमार हो गयी है फिर बड़े परदे और थ्री डी एफ़ेक्ट के साथ इस फिल्म को देखना अच्छा लग रहा था लेकिन जितना अच्छा डांस था इस फिल्म का उतना ही अच्छा संगीत भी होता तो और अच्छा होता। 

 हालांकि फिल्म में मुख्य कलाकार वरुण धवन और श्रद्धा हैं  लेकिन  निर्देशक रेमो ने  राघव जुयल , लॉरेन गोटटलिब, धर्मेश येलांदे , पुनीत आदि सभी डांसर को पूरा मौका दिया है फिल्म में , जब भी फिल्म में डांस होता था तो ऐसा नही लगा की फिल्म का नायक वरुण हैं लगता था की एक ग्रुप परफॉर्म कर रहा है न की एक नायक या नायिका।  असली जिंदगी के २ डांसर की जिंदगी पर आधारित इस फिल्म में अगर दर्शक कहानी खोजने निकलेगें  तो कहीं भी नही दिखाई देगी उन्हें अगर डांस का लुत्फ़ उठाने जायेगे तो निस्संदेह आपको फिल्म अच्छी लगेगी।  कुछ डांस मूव तो बहुत बेहतरीन हैं जिन्हें  आप पलक बिना झपकाएँ देखेगें।  
अभिनेता वरुण धवन के बारें में सब जानते ही हैं कि वो अच्छे डांसर हैं लेकिन इस फिल्म से श्रद्धा कपूर को भी फायदा मिलेगा क्योंकि अभी तक उन्हें रोने - धोने और सीधे - सादे से ही रोल मिलें हैं लेकिन अब उन्हें फिल्म में नाचने के भी भरपूर मौके मिल सकेगें। 
बहुत सारा डांस देखना है आप जरूर जायें फिल्म #एबीसीडी - २ 


--फिल्म  "ए बी सी डी -२" 

सोमवार, 15 जून 2015

फिल्म हमारी अधूरी कहानी में कहानी अधूरी, दर्शक अधूरे और सफलता भी अधूरी

पी वी आर, सिटी मॉल, अँधेरी वेस्ट सुबह ११ बजकर १५ का शो टाइम , शो शुरू हुआ ११. ४० पर।  सबसे पीछे की २ लाइनें बिलकुल खाली।  उसके बाद हर लाइन में कुछ - कुछ कुर्सियां खाली और प्लैटिनम सीट तो बिलकुल ही खाली।  आप सोच सकते हैं कितने दर्शक होंगें थियेटर में।  लेकिन यह देख कर अच्छा लगा की दर्शक मिले जुले थे यानि सिर्फ महिलायें ही नही थी बल्कि ग्रुप में आये हुए लड़के भी थे जो कि मध्यांतर के बाद की फिल्म के संवादों पर बार - बार हंस रहे थे , जैसे तुम अपनी हवस  वासना  के लिये मेरे पास आये हो  और मैं कोई सड़क पर पड़ा हुआ सिक्का नही हूँ।  इस तरह के संवाद आज की फिल्मों में होते ही नहीं हैं तो आज की पीढ़ी लिये तो इस तरह के संवाद हास्य का विषय ही हैं दूसरे इस तरह के संवादों की जरूरत भी नही थी , खैर कई बार लगा कि #महेश भट्ट कुछ ज्यादा ही भावुक हो गये इस फिल्म के साथ तो कहानी , संवाद सब कुछ अधूरा ही हो गया , क्योंकि वो बह गये भावनाओं में। फिल्म में एक दृश्य तो बिलकुल विद्या की ही एक दूसरी फिल्म #कहानी के जैसा था. 
   
#मोहित सूरी की पिछली फिल्म #आशिक़ी - २  हालांकि हिट हुई शायद संगीत की वजह से ,लेकिन वो भी बहुत ही निराशाजनक फिल्म थी और इस फिल्म का पहला भाग भी बहुत निराशाजनक था। दूसरा भाग पहले से बेहतर था।फिल्म कभी दुबई , कलकत्ता , शिमला , बस्तर , छत्तीसगढ़ न जाने पल भर में कहाँ से कहाँ पंहुच जाती है समझ ही नही आता। 
  
गीत - संगीत भी उदास, कलाकार भी सब उदास ,  सोचा था विद्या बालन की बहुत दिनों के बाद कोई फिल्म आ रही है अच्छी होगी उसे परदे पर देखना अच्छा लगता है लेकिन निराशा ही हाथ लगी ऐसा नही है की उसने, राजकुमार राव या इमरान ने काम अच्छा नही किया हो, क्या कर सकता है कलाकार जब कहानी ही भटक जाये।

८० के दशक की कहानी प्रेम कहानी लेकिन जिसमें दर्द ही दर्द है आरव का बचपन दर्द से भरा, विद्या का वैवाहिक जीवन दर्द  भरा , दो दर्द भरे व्यक्ति आपस में मिलते हैं तो उन्हें प्यार हो जाता है कि एक दूसरे के लिये कुछ भी कर गुज़रने के लिये तैयार हो जाते हैं। कुछ संवाद दिल को छू जाते हैं प्यार में लेना देना कैसा , कब तक  प्यार में यह सौदा हो , सच्चे प्यार में सिर्फ देना ही होता है " 

परम्परा , संस्कार , सिन्दूर , मंगल सूत्र के नाम पर कब तक से जबरदस्ती बाँध कर रख सकते हैं पति अपनी पत्नियों को , पत्नी का मालिक बन कर उसके हाथ में जबरदस्ती अपना नाम लिखवाना।  वसुधा , आरव की माँ , वसुधा की सास कई महिलाओं का जीवन दिखाया है फिल्म में। 

एक बात काबिले तारीफ है इस फिल्म में , जो की आम तौर पर भट्ट कैंप की फिल्मों में होता ही नही है वैसे तो  आजकल किसी भी फिल्म में ऐसा नही होता ।  कोई अंग प्रदर्शन नही , अश्लील संवाद नही , पहले भाग में शराब का गिलास भी नही नायक के हाथों में जबकि नायक बहुत ही अमीर है।  दूसरे भाग में एक - दो पैग पीता दिखाई दिया बस तो थोड़ा आश्चर्य था लेकिन अच्छा लगा।  


रविवार, 7 जून 2015

दिल नही धड़का -- "दिल धड़कने दो" में

जोया अख्तर की ताज़ा तरीन रिलीज़ फिल्म "दिल धड़कने दो " सिने मैक्स, वर्सोवा सुबह ११ बजे का शो , जिसमें ४० % दर्शक थे।  ११ बजे का शो था लेकिन फिल्म शुरू हुई करीब ११.३० पर।  दर्शक बैचेन कब फिल्म शुरू हो , थक गये परफ्यूम , क्रीम और भी कई तरह के विज्ञापन देखकर आखिरकार  फिल्म शुरू हुई। 
फिल्म शुरू हुई एक सूत्रधार की आवाज़ के साथ जो की फिल्म की कहानी व  किरदारों परिचय कराता है , यह हैं कमल मेहरा, यह  हैं उनकी पत्नी , यह बेटा , यह बेटी, यह ये यह वो. करीब १० मिनट के बाद पता चलता है  कि कहानी सुनाने वाला मेहरा परिवार का ही कुत्ता है प्लूटो मेहरा।  इस प्लूटो की भी किस्मत खुल गयी क्योंकि इसकी आवाज़ की डबिंग की है अभिनेता आमिर खान ने।  इसने इस परिवार के सभी सदस्यों को करीब से देखा है कि कौन कैसा है ? बेजुबान होते हुए भी शुरू से अंत तक यही दर्शकों को कहानी बताता जाता है। 

क्रूज़ की सैर करने का मन हो , गॉसिप पर हंसने का मन हो या दोहरी मानसिकता देखनी हो।  अंदर से दुखी परिवार लेकिन समाज के सामने आदर्श परिवार और पति पत्नी देखने हो तो जरूर देखें यह फिल्म जिसका नाम है "दिल धड़कने दो " लेकिन फिल्म में सच कहें तो दिल कहीं भी नही धड़का , कभी धड़कन नही बढ़ी क़ि अब क्या होगा ?

ज़ोया की यह चौथी फिल्म है सबसे पहले  #लक बाय चांस # जिंदगी न मिलेगी दोबारा #बॉम्बे टाकीज़ -  शीला की जवानी और अब #दिल धड़कने दो।  इस फिल्म को देखकर ऐसा लगा की हम #करन जौहर या #सूरज बड़जात्या की कोई फिल्म देख रहे हो।  एक परिवार , उनके दोस्त , रिश्तेदार बिजनिस में घाटा , घाटे को कंट्रोल करने के लिए दोस्ती को शादी में बदलने का ड्रामा। ऐसा कहीं भी नही लगा की यह उसी निर्देशक की फिल्म है जिसने जिंदगी न मिलेगी दोबारा' बनाई थी। एक बात ओर यह भी देखना होगा कि ज़ोया पहले स्टोरी फाइनल करती है या लोकेशन क्योंकि उनकी सारी फिल्में ऐसी ही लगती हैं कि वह पहले लोकेशन स्पोंसर कराती है फिर कहानी निश्चित की जाती हैं ।  

फिल्म में हाई सोसायटी दिखाई है लेकिन फरहान अख्तर के संवाद ऐसे हैं जैसे मध्यम वर्गीय परिवार आपस में बातें करता है , उन्हें ही सबसे ज्यादा चिंता होती है समाज और लोगों की। हाई सोसायटी के लोग तो अपनी मनमानी करते हैं उन्हें कब समाज की परवाह होने लगी। ऐसे परिवार के लड़के एक डांसर से टाइम पास जरूर कर सकते हैं पर घर में नही लाते।    

 फिल्म में कुछ भावुक सीन भी हैं जिन्हें देखना अच्छा लगता है "जब सारा मेहरा परिवार एक साथ हो जाता है".  बिजनिस परिवारों में लड़का  -लड़की को बराबरी का दर्जा देने वाली बात भी अच्छी है।  #अनिल कपूर की बात आज भी निराली है , जितना जोश पहले था आज भी है , #शेफाली अच्छी अदाकारा हैं उनके कुछ सीन बेहद अच्छे हैं, #प्रिंयका और #रनवीर बहन भाई की जोड़ी अच्छी है , बाकी कलाकार जिनमे #राहुल बोस #अनुष्का , #
फ़रहान और जरीना बहाब एक्स्ट्रा जैसे लग रहे थे। 

गीत - संगीत पुराना , #शंकर #अहसान #लॉय यह क्या किया आपने, आपसे ऐसे उम्मीद नही है  
हाँ यह बात बिलकुल पक्की है कि इस फिल्म को देखकर सभी दर्शकों का क्रूज़ पर जाने का जरूर मन करेगा।  

सोमवार, 1 जून 2015

अगर दिमाग नही लगाना और थोड़ा हँसना है तो वेलकम टू कराची

इस सप्ताह रिलीज़ हुई फिल्म "वेलकम टू कराची " जिसका ट्रेलर देख कर मैं फिल्म देखने गयी थी।  "फन सिनेमा " अँधेरी वेस्ट में सुबह ११. ५० के शो में लगभग ७०% सीट भरी हुई थीं।  वैसे मैं यह फिल्म देखने सिर्फ और सिर्फ अरशद वारसी के लिये ही गयी थी ,क्योंकि उनकी पिछली फिल्म "जॉली एल एल बी"  मुझे क्या सभी को बहुत पसंद आयी थी और फिर कॉमिक सेंस की बात करें तो  उनसे तो कोई बेहतर है नहीं और वैसे भी यह फिल्म तो उनके ही भरोसे थी उनके ही कन्धों के ऊपर थी क्योंकि #जैकी भगनानी ने अभी कोई तीर तो मारा नही है। जिसकी हम उम्मीद करें।  वैसे निर्माता #वाशु भगनानी यानि जैकी के पूज्य पिताजी उन्हें १५-१७ फ़िल्में तो करवा ही सकते हैं फिर शायद उनकी गाड़ी कुछ चल निकले जूनियर बच्चन की तरह। 

लेकिन इस फिल्म में जैकी ने एक सीधे सादे #गुज़राती युवक की भूमिका अच्छी अभिनीत की है, उन्होंने गुज़राती भाषा के उच्चारण में भी काफी मेहनत की है। फिल्म का पहला भाग तो काफी कुछ ठीक है लेकिन दूसरे भाग में निर्देशक #आशीष मोहन कई बार भटक गये हैं।  कुछ संवादों में तो बहुत हंसी आती है लेकिन कई बार फिल्म इतनी बोर लगती है लगता है कि अब खत्म हो जाये तो अच्छा है ।  

#अरशद वारसी ने अच्छा अभिनय किया है उनके संवाद सुनकर हंसी आती है अगर उनका अच्छा साथ मिला होता तो शायद फिल्म और बेहतर हो सकती थी। 

जो कमाल निर्देशक ने अपनी पिछली फिल्म "खिलाडी ७८६ " (२०१२ )  में दिखाया था इस फिल्म में उनसे कुछ चूक हो गयी है। फिल्म की कहानी अच्छी शुरू हुई थी पाकिस्तान में जिस तरह से हालात हैं तालिबानी हमले और बहुत कुछ बैन वो सब बहुत अच्छा है. 

यू एस की डांसर और अभिनेत्री लॉरेन गोटिलेब  ने हमेशा की तरह अच्छा डांस किया है बाकी कुछ ज्यादा था ही नहीं उनके हिस्से में । 

लेकिन क्या सच में गुज़राती इतने सीधे कहो या बेवकूफ होते हैं जितना उन्हें इस फिल्म में दिखाया है।  इस पर कोई बहस नही क्योंकि यह तो फिल्म है हक़ीक़त नहीं। 

गीत - संगीत भी कुछ प्रभाव नही छोड़ता।  जी पर लात लगने जैसे गीत लगता है आम बात हो गयी है।  
अगर दिमाग नही लगाना और थोड़ा हँसना है तो वेलकम टू कराची .

सोमवार, 25 मई 2015

फिल्म "तनु वेड्स मनु रिटर्न्स " -- दत्तो है आज के ज़माने की लड़की

फिल्म 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स" सही मायने में सन २०११ की सुपर हिट फिल्म "तनु वेड्स मनु " की सीक्वेल है।  क्योंकि इस फिल्म की कहानी वही से शुरू होती है जहाँ पिछली फिल्म खत्म हुई थी. हास्य और ड्रामा से भरपूर फिल्म इस फिल्म में जहाँ दर्शकों को भरपूर हँसने का मौका है वहीँ दत्तो ( दोहरी भूमिका कंगना की ) में गज़ब का आत्म विश्वास देखने को मिलता है। कंगना तो इस समय अपने अभिनय की उस मुकाम पर हैं जहाँ वो अकेले ही फ़िल्में चलाने में माहिर हो गयी हैं। 

क्या कभी किसी भी सोचा था कि कंगना की महिला प्रधान फ़िल्में एक के बाद एक आयेगीं और वो सफल भी होंगी। लेकिन अभी  हम यहाँ बात कर रहे हैं फिल्म "तनु वेड्स मनु रिटर्न्स " की. तो सब कुछ अच्छा है फिल्म में जहाँ तनु चंचल है अपने में मस्त है वहीँ मनु बहुत ही शांत हैं और दत्तो आज के ज़माने की लड़की है जो अपने बल पर कुछ भी करने की तमन्ना रखती है. राजा अवस्थी फिल्म में पहले फिल्म की बजाय काफी शांत है.  पप्पी केहिस्से में ज्यादा संवाद है। 

चिंटू ( मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब ) तनु का नया प्रेमी है। दत्तो के भाई के रूप में  (राजेश शर्मा ) ने भी प्रभावित किया है। लेखक हिमांशु शर्मा और निर्देशक आनंद रॉय ने सभी से अच्छा काम लिया है 

कुल मिलाकर इस सप्ताह दर्शकों के लिये अच्छी फिल्म है 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स" जिसे पूरा परिवार एक साथ मिलकर देख सकता है और हंस सकता है बगैर एक दूसरे से आँखे चुराते हुए। अभी तक कैमरे से कबूतर निकलता हुआ सुना था लेकिन इस फिल्म में दत्तो (कंगना ) के हाथ से कई कबूतर उड़ते दिखाई दिए हैं।  

आप भी इस फिल्म को देखें और बताइये आपको कैसी लगी ?





सोमवार, 18 मई 2015

मुंबई के विकास की कहानी बॉम्बे वेलवेट

निर्देशक @अनुराग कश्यप की फिल्म #बॉम्बे वेलवेट के बारें में बहुत सी बातें सुनने को मिलीं।  जिसमें से अच्छी कम बुरी ज्यादा थी।  मैं भी बेमन से इस फिल्म को देखने गयी। देखने इसलिए गयी क्योंकि यह फिल्म अनुराग कश्यप द्वारा निर्देशित थी तो उत्सुकता तो थी ही। 

जब तक फिल्म की कहानी बनी यानि हीरो - हीरोइन छोटे थे फिल्म जरूर नीरस लग रही थी लेकिन जैसे ही  रणबीर कपूर परदे पर आये फिल्म में जान आ गयी शुरू से लेकर आखिरी तक उनका अभिनय लाजवाब रहा।  

  लेखक @ज्ञान प्रकाश की किताब "मुंबई फैबल्स " पर आधारित इस फिल्म में बड़े ओहदों पर बैठे अफसर, नेता, पुलिस अधिकारी और अखबारों के एडिटर कैसे - कैसे जोड़ तोड़ करते हैं और किस हद तक नीचे गिर जाते हैं।  इस फिल्म में  पांचवे और छठे दशक का  बॉम्बे दिखाया गया है। फिल्म में जोड़ तोड़ , गलत तरीके से अपना काम निकालना यह सब है। छोटी - छोटी चोरी करते - करते बलराज से जॉनी बने ( रणबीर कपूर ) और जैज गायिका रोज़ी (अनुष्का ) के प्यार की कहानी के साथ - साथ मुंबई के विकास की कहानी भी है कि कैसे मिल मजदूरो के कब्रिस्तान पर मुंबई की बड़ी- बड़ी इमारतें बनी।  बहुत कुछ सच्ची घटनाओं से प्रेरित भी है फिल्म। सच्चाई हमेशा कड़वी होती है तो कई बार फिल्म नीरस भी हो जाती है। 

एक खलनायक के रूप में @करन जौहर ने अच्छा काम किया है। आखिरी का एक संवाद जिसमें वो जॉनी से कहते हैं "तूने रोज़ी में ऐसा क्या देखा जो मुझमें नही है"  इसे सुनकर दर्शक बहुत जोर - जोर से हंस रहे थे. अनुष्का का काम भी अच्छा था लेकिन मुझे एक बात समझ नही आयी रोज़ी के किरदार के लिये उन्होंने अपने होठों के साथ खिलवाड़ क्यों किया। के के मेनन (पुलिस अफसर ) सत्यदीप मिश्रा (बलराज का दोस्त - चिमन ) सभी का काम अच्छा था। 

बुरा था कि सब कुछ दिखाने के चक्कर में फिल्म बड़ी बन गयी, कुछ छोटी हो जाती तो फिल्म से नीरसता चली जाती और दर्शक ज्यादा आनंद उठा पाते और फिल्म के निर्माता भी अपनी लागत निकाल पाते।   

सोमवार, 11 मई 2015

क्यों देखें फिल्म #पीकू

क्यों देखें फिल्म #पीकू क्योंकि इस फिल्म में अमिताभ बच्चन हैं और आप बच्चन साहब के प्रशंसक हैं  तब तो आप को इस फिल्म को देखना ही चाहिये। साथ ही ख़ूबसूरती से फिल्माये गये पिता और बेटी के खूबसूरत रिश्तों को देखना चाहते हैं।  

शुरू से आखिरी तक फिल्म में बच्चन ही बच्चन हैं।  फिल्म की कहानी देखें तो 
बस कब्ज़ पर आधारित है।  करीब ७० साल के भास्कोर बनर्जी को कब्ज़ की बिमारी है वो सारी फिल्म में इसी के बारें में बात करते हैं  उनके घर में बस इसी के बारें में बातें होती हैं। 

हास्य और भरपूर ड्रामा है फिल्म में। कुछ इमोशनल सीन भी हैं फिल्म में,  जो आँखे नम कर जाते हैं।  लेकिन कुछ ऐसी बातें भी फिल्म में जिसके लिये मन नही मानता की कोई पिता अपनी बेटी के बारें में इतना खुल कर बोल सकता है कि उसकी बेटी वर्जिन नही है वो भी किसी दूसरे पुरुष के सामने।  

दीपिका और इरफ़ान का काम अच्छा है जितना भी उनके हिस्से में आया है। फिल्म के निर्माता - निर्देशक इस फिल्म का नाम 'भेजा फ़्राय -३'  भी रखते तो ज्यादा अच्छा होता।  
फिल्म 'आनंद' में भी अमिताभ बच्चन का नाम भास्कर बनर्जी था।  

सोमवार, 9 मार्च 2015

मिलते हैं अगले Monday को #NH 10 के साथ

इस सप्ताह कोई भी ऐसी #film फिल्म नही रिलीज़ हुई जिसका #review किया जाये। तो मिलते हैं अगले Monday को  #NH 10 के साथ, तब तक आप #ICC Cricket World Cup 2015 का लुत्फ़ उठाइये। 

सोमवार, 2 मार्च 2015

फिल्म समीक्षा --- दम लगा के हईशा

फिल्म "दम लगा के हईशा " में वैसे तो कोई बहुत बड़े स्टार नहीं हैं लेकिन इस फिल्म में फिल्म की कहानी , निर्देशन , संवाद और अभिनय ही स्टार हैं।  एक बहुत ही सादी सी कहानी को बहुत ही उम्दा तरीके से इस फिल्माया गया है .

९० के दशक की कहानी है फिल्म में। उत्तर प्रदेश का एक लोकप्रिय शहर हरिद्वार , जिसमें एक कैसेट की दुकान हैं उसमें बैठने वाला प्रेम (आयुष्मान खुराना ) जिसे अंग्रेजी के प्रश्न पत्र , अपने पिताजी की चप्पल और कुमार सानू के गीतों में ही सबसे ज्यादा दर्द नज़र आता है। कुमार सानू के गीतों का दीवाना प्रेम दसवीं भी पास नही कर सका।  प्रेम की शादी  उसके घरवाले पिताजी ( संजय मिश्रा) माँ ( अलका अमीन ) बुआ ( शीबा  चड्डा )  उसकी मर्जी के बिना एक पढ़ी लिखी बी ए बी एड पास लेकिन मोटी लड़की संध्या  ( भूमि पेडणेकर ) से करा देते हैं यह सोच कर कि  लड़की पढ़ी लिखी है तो नौकरी करेगी तो कुछ अच्छे दिन उनके भी आ जायेगें। लेकिन  प्रेम को एक खूबसूरत सी स्लिम सी लड़की चाहिये थी। जिसे लेकर वो यहाँ वहाँ घूमने में ख़ुशी महसूस कर सकें।  प्रेम को संध्या पसंद नही आती वो उसके वजन को लेकर सबके सामने मजाक बनाता है।  पढ़ी लिखी संध्या अपना अपमान बर्दाश्त नहीं कर पाती और अपने मायके चली जाती है और तलाक की अर्जी दे देती है. लेकिन जज के कहने पर वो दोनों फिर ६ महीने के लिये साथ रहने को तैयार हो जाते हैं।

इसी दौरान हरिद्वार में 'दम लगा के हईशा " प्रतियोगिता का आयोजन होता है और अपनी बुआ के कहने पर इसमें प्रेम भी  संध्या के साथ हिस्सा लेने को तैयार हो जाता है और जीत जाता है।  प्रेम और संध्या भी हंमेशा के लिये एक दूसरे के पास आ जाते हैं.  
वैसे तो इस तरह की बेमेल शादी बहुत होती हैं रूपये पैसे और दहेज़ के लिये।  इस फिल्म में भी संध्या की शादी उसकी टीचर की नौकरी के लिए होती है।
फिल्म में कुछ दृश्य बहुत ही मनोरंजक हैं जैसे  ९० के दशक की कहानी है फिल्म में तो फिल्म में प्रेम और संध्या के बीच लड़ाई भी उस समय के हिट गीतों को टेप रिकॉर्डर में बजा कर होती है। प्रेम को अंग्रेजी नही आती वो उससे दूर ही भागता है लेकिन जब संध्या अपने मायके चली जाती है तब प्रेम तीसरी बार दसवीं की परीक्षा देता है लेकिन उसे अंग्रेजी नही आती तो हिंदी में ही उत्तर पुस्तिका में एक चिठ्ठी लिख आता है कि आज वो आत्म हत्या कर लेगा तो उसी रात में उसके घर टीचर और पुलिस का आना। स्लिम होने के चक्कर में संध्या का उबला हुआ खाना खाना ,

फिल्म में हरिद्वार जैसे शहरों की मानसिकता को भी बहुत ही खूबसूरती से दिखाया है निर्देशक शरत कटारिया ने. ९० के दशक की फिल्म हो और कुमार सानू का जिक्र न हो यह तो हो ही नहीं सकता। फिल्म का नायक प्रेम कुमार सानू का दीवाना दिखाया है तो फिल्म में गीत भी उन्हीं की आवाज़ में हैं और फिल्म में आखिरी में भी वो कुमार सानू के ही  रूप में नज़र भी आते हैं।  हो सकता है इस फिल्म के बाद फिर एक बार उनके चाहने वालों को उनके गाये गीत सुनने की मिल जायें।  

फिल्म में मनोरंजन भी है साथ में एक सन्देश भी है केवल शारीरिक सौंदर्य ही सभी कुछ नही होता , अच्छा व्यवहार भी साथ साथ जिन्दगी बिताने के लिये बहुत मायने रखता है।

स्वतंत्र निर्देशक  के रूप में शरत की यह पहली ही फिल्म है लेकिन इससे पहले उन्होंने कुछ फिल्मों में सहायक निर्देशक और लेखक के रूप में काम किया है।

कुल मिलाकर आप जब फिल्म देखने जायेगें तो आपको बोरियत तो बिलकुल भी नही होगी हाँ मनोरंजन जरूर होगा।  फिल्म रिलीज़ के तीन दिन के बाद जितने दर्शक सिनेमा हॉल में थे उसके मुताबिक़ फिल्म निर्माता यानि यशराज़  फिल्म्स को फायदा ही हुआ होगा।
हिंदी फिल्मों के गुज़राती फिल्म निर्माता जो की कई वजहों से चर्चा में रहे थे अपनी नई प्रेयसी के साथ फिल्म का आनंद ले रहे थे। 

आखिरी नोट --- दर्शक जब फिल्म देखने जाते हैं तब उन्हें अपने फोन पर नही फिल्म में ध्यान देना चाहिये , अगर कुछ जरुरी काम है तो हॉल से बाहर जाकर कर लें जिससे दूसरे दर्शको तकलीफ़ न हो। 

आप भी इस फिल्म के बारें में कुछ कमेंट्स लिखना चाहे तो प्लीज़ जरूर लिखे।  मेरी समीक्षा में कमी नज़र आये तो उससे भी अवगत करायें। धन्यवाद !